194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की गई व्यवस्था के समान है और उसका क्रियान्वयन संतोषजनक है तो यह उपबंध उस कारखाने पर लागू नहीं होगा। मैंने देखा है कि इस मामले में ग्रेट ब्रिटेन में भी यही स्थिति है। ब्रिटिश प्रणाली में सवेतन अवकाश 1938 से लागू है और 2,300,000 कर्मचारी इसके अधीन आते हैं। इसके अतिरिक्त 50 लाख लोगों को यह स्वैच्छिक समझौते के अधीन मिलती है जिन पर कानून लागू नहीं है और 4000700 लोगों को यह दीर्घकालीन प्रथा के अनुसार प्राप्त होती है।
सर कोवसजी जहांगीरः इसके लिए कहां व्यवस्था है जब कोई मालिक उन छुट्टियों को निलंबित कर दे?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मैं इस मुद्दे पर आ रहा हूं। अभी में एक दूसरे मुद्दे पर बोलना चाहता हूं, वह है अनिवार्य बनाम स्वैच्छिक।
दूसरा मुद्दा मेरे मित्र प्रो. रंगा ने उठाया है और श्री चेट्टियर ने भी। वह है कि हमने इस बारे में व्यवस्था नहीं की है कि जब कोई मालिक बेइमानी करना चाहे तो वह अपने कर्मचारी को अर्जित अवकाश से वंचित रखने के लिए उसे कार्य मुक्त कर सकता है। इस बात पर मैंने अपने आरंभिक भाषण में कहा था कि सरकार को यह अहसास है कि कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। परंतु सरकार नहीं सोचती कि वह इस बारे में कोई कदम इस समय उठाए। सरकार इंतजार करेगी और देखेगी कि किस पक्ष ने दूसरे के विरुद्ध क्या तरीका अपनाया है। परंतु यदि इसके बारे में कोई पुष्ट धारणाएं हैं तो श्रमिकों के प्रतिनिधि प्रवर समिति को समझाएं कि ऐसा करना अभी आवश्यक है ताकि अधिनियम में वह ऐसी हरकतों पर रोक लगाने की व्यवस्था अभी से की जा सके। सरकार नहीं समझती कि सिद्धांत रूप से यह कोई गलत बात है और वह प्रवर समिति के माध्यम से इसको सरंजाम देने के मार्ग में बाधा नहीं डालेगी।
एक अन्य मुद्दा उठाया गया है कि क्या छुट्टियों की बात परू तरह कर्मचारियों की इच्छा पर छोड़ दी गई है अर्थात श्रमिकों को यह अधिकार दिया गया है कि वे वह तिथि निर्धारित कर सकें कि वे कब से छुट्टियां लें। हमने विधेयक में जानबूझकर उसकी व्यवस्था नहीं की है क्योंकि हमने यह प्रांतीय सरकारों पर छोड़ दिया है कि किसी खास मुद्दे से निपटने के लिए वे अपनी ओर से नियम बना लें। मैं सोचता हूं कि इस प्रकार का प्रयोग करके देखा जाए और हर बात कानून पर न छोड़ दी जाए। यह बेहतर होगा कि हमने विधेयक में जो चीजें प्रांतीय सरकारों पर छोड़ दी हैं वे उन्हें विनियमित करें क्योंकि सदन को पता है कि किसी नियम को बदलना बहुत सरल है, कानून को बदलना कठिन। परंतु जैसाकि मैंने कहा, यदि इस विधेयक से संबद्ध पक्ष चाहे कि इसे वैधानिक रूप दिया जाए तो यह प्रवर समिति के अधिकार में है।