वेतन भुगतान (संशोधन) विधेयक
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ओर दिलाना चाहता हूं कि मौजूदा अधिनियम में क्या-क्या छूटा हुआ है। उदाहरण् ार्थ इसमें स्पष्ट नहीं किया गया है कि काम छोड़ देने के बाद कर्मचारी ने भविष्य निधि और ग्रेच्युटी की राशि ले ली है परंतु वह उन सुविधाओं से वंचित रह जाता है जो यदि वह नौकरी में रहा होता तो उसे प्राप्त होतीं। इसके कुछ विशेष कारण हो सकते हैं। उसे शायद इसलिए जल्दी अवकाश प्राप्त करना पड़ा हो कि भविष्य निधि और ग्रेच्युटी का पैसा मिल जाए और उसकी कुछ अतिआवश्यक आर्थिक जरूरतें पूरी हो जाएं। बाद में यदि उसने फिर नौकरी कर ली तो स्वाभाविक है कि वह उन सुविधाओं की फिर प्राप्ति चाहेगा जो उसे अवकाश ग्रहण से पूर्व प्राप्त थी और यह सुविधा इस बात पर निर्भर है कि वह भविष्य निधि और ग्रेच्युटी की राशि लौटाने को तैयार हो जो कि उसने ले रखी है। कर्मचारी इसकी कटोती कराने को तैयार और इच्छुक भी हो तो कानून में उसकी अनुमति की व्यवस्था नहीं है। मैं समझता हूं कि इन कटौतियों की अनुमति होनी चाहिए क्योंकि ये स्वयं कर्मचारी के पक्ष में है। परंतु जैसा मैं कह चुका हूं, से प्रावधान में मौजूदा कानून नहीं हैं। फिर श्रीमन्, कुछ ऐसी कटौतियां हैं जो कर्मचारी के लिए लाभप्रद हो सकती है और कर्मचारी यह चाहता भी हो कि ये कटौतियां कर ली जाए ताकि उसे इससे लाभ हो सके। ऐसा प्रावधान नहीं है कि कर्मचारी स्वेच्छा से इन कटौतियों के लिए सहमत हो तो ये कटौतियां की जाएं जो उसकी दृष्टि में लाभकारी हैं। इस संशोधन के माध्यम से कानून में व्यवस्था है कि उद्देश्य वास्तव में लाभदायी हो। धारा 7 में कुछ और भी छूटा हुआ है और इसका संबंध ऐसे मामलों से हैं जो नियमित वेतन वृद्धि की श्रेणी में हैं। यदि वेतन में एक के बाद दूसरी कटौती होती है, तो उसे वेतनमान से निम्न वेतनमान में नयावनत कर दिया जाता है। तीसरे कर्मचारी को एक वेतनमान में रखने से संबद्ध है, वेतन में कटौती कार्यक्षमता घटने पर की जाती है। इसी कारण यह आवश्यक हो गया है कि धारा 4 की उपधारा (3) में यह संशोधन किया जाए जिसका आधार सिंध के न्यायिक आयुक्त द्वारा दिया गया फैसला है। यह एक ऐसा मामला था जब एक श्रमिक ने अदालत का द्वार खटखटाया। शायद वह एक इंजन चालक था। उसका वेतनमान बदस्तूर रखा गया था, किन्तु वेतन घटा दिया गया था। वह न्याय पाने के लिए अदालत में गया और कहा कि उसके वेतन में कटौती कर दी गई जबकि उसे पुराने वेतनमान में ही रखा गया है और कानूनी दृष्टि से यह एक अवैध कटौती है। जज ने उसका तर्क मान लिया और कहा कि कटौती अवैध थी। परंतु जज ने कहा कि कर्मचारी के साथ कोई नया समझौता नहीं किया जाता है और उसमें कहा जाता है कि जब उसकी कार्य क्षमता वांछित स्तर की नहीं थी जो उससे तैनात पदण पर अपेक्षित है, और यदि यह समझौता कर्मचारी को स्वीकार्य है, तो कटौती न्यायसंगत होगी। अब मैंने इस विधेयक में यह किया है कि जज द्वारा दिया गया सुझाव स्वीकार