200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कर लिया है कि जब तक किसी कर्मचारी की सेवाओं की निर्धारित अवधि समाप्त न हो जाए तब तक इस आधार पर उसका वेतन नहीं घटाया जा सकता कि उसकी कार्यक्षमता में ह्रास आ गया है। श्रीमन्, इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि उसे एक मास की पूर्व सूचना दी जाए। यह एक पूर्ण और सरल प्रक्रिया होगी। एक कानूनी नोटिस दिया जाए कि ‘‘हम आपको पहले के समान वेतन नहीं दे सकते, यदि आप नई शर्त पर सेवा में रहना चाहें तो रहें, यदि न रहना चाहें तो सेवा छोड़ दें।’’ हमने उस लंबी प्रक्रिया को सरल बना दिया है जिसमें पहले नोटिस दिया जाता था, फिर उसका उत्तर आता था, प्रस्ताव आता था, उसे अस्वीकार किया जाता था। अब हमने दोनों को मिलाकर एक कर दिया है। अब एक महीने के नोटिस की अवधि रखी गई है। नोटिस की अवधि समाप्त होने से पूर्व यदि कर्मचारी मालिकों से कह देता है कि उसे प्रस्ताव स्वीकार नहीं है तो वह सेवामुक्त हो सकता है। यह आलोचना गलत होगी कि इस संशोधन से हम कर्मचारी-विरोधी कार्य कर रहे हैं या अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त के फैसले को लागू नहीं करना चाहते। मैं सदन को बता दूं कि मैं एसा कुछ नहीं कर रहा हूं। सिर्फ न्यायिक अधिकारी के फैसले पर अमल करना चाहता हूं, इसलिए यह संशोधन रखा गया है।
जहां तक दूसरे संशोधनों का प्रश्न है, जैसे वेतन वृद्धि पर रोक और ऊंचे वेतनमान से नीचे वेतनमान पर रखना, इस बारे में कोई विवाद नहीं हो सकता क्योंकि तरक्की की अवधि ऐसी निर्धारित की गई है कि तभी पद वृद्धि की जाएगी जब मालिक को यह संतोष हो जाएगा कि कर्मचारी ने मौजूदा वेतनमान में रहते हुए इतना अनुभव और क्षमता प्राप्त कर ली है कि उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह उच्च वेतनमान के दायित्व संभाल सकता है। उदाहरणार्थ, यदि उसकी तरक्की नहीं होती है तो कोई आपत्ति नहीं होगी क्योंकि उसका सीधा कारण है कि उसमें उतनी क्षमता नहीं आई है जितनी चाहिए।
ऐसा ही दूसरे मामलों में है, जैसे ऊंचे वेतनमान से नीचे वेतनमान में पदावनति। मेरे विचार में इसमें कोई वैध आपत्ति नहीं हो सकती। कारण सीधा सा है कि जब मालिक की दृष्टि में किसी कर्मचारी की कार्य क्षमता इतनी नहीं रह जाती तो उसे उसी वेतन में नहीं रखा जा सकता। मैं सोचता हूं कि यह न्यायोचित है कि उसका वेतन घटा दिया जाए और उतनी ही उसकी जिम्मेदारी भी कम कर दी जाए।
अब मैं विधेयक के खंड 5 पर आता हूं जो एक सरल सा खंड है। यह धारा 8 की उपधारा (7) में संशोधन करता है। धारा 8 की उपधारा (6) में उस अवधि का उल्लेख है जब से उस पर लागू जुर्माने की रकम वसूल की जा सकती है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वह समय क्या हो। क्या यह तब से लागू हो जब कोई