202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक प्रवर समिति को सौंपा जाए जो सेठ यूसुफ अब्दुल्ला हारून, श्री मोहम्मद हुसैन चौधरी, श्री लाल चंद राय, नवल श्री ए.सी. इंसकिय, सर विट्ठल एन. चन्दावरकर, श्री एन. एम. जोशी, डॅा. सर रतन जी, दिनशा दलाल, श्री डी.एस. जोशी और प्रस्तावक द्वारा गठित की जाए और समिति की बैठक के लिए पांच सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।’’
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श्री एन. एम. जोशी ...........श्रीमन्, माननीय सदस्य ने कुछ और संशोधन भी प्रस्तुत किए हैं उनमें से एक है अनुपस्थिति पर कुछ कटौतियां।
* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैनें अनुपस्थिति की परिभाषा ही दी है। मैंने कटौतियों की अनुमति नहीं दी है। वे पहले से ही मौजूद है।
श्री एन. एम. जोशीः मुझे पता है। माननीय सदस्य बहुत भोले हैं। उन्होंने अनुपस्थिति की परिभाषा बदल दी है, परिणामस्वरूप कुछ कटौतियों की अनुमति मिल गई। मूल अधिनियम के अनुसार, कटौतियां काम न करने की वास्तविक अवधि के लिए की जा सकती है। यदि संशोधन कर दिया गया, तो मैं समझता हूं कि किसी भी मालिक के लिए यह संभव होगा कि वह कर्मचारी को दोहरी सजा दे दे।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह सही नहीं है।
श्री एन. एम. जोशीः ठीक है, हम इस पर समय आने पर चर्चा करेंगे। हो सकता है कोई कर्मचारी एक घंटा गैर-हाजिर रहता है, तो उतने समय का उत्पादन नहीं कर पाता और इसलिए उस घंटे के काम का भुगतान उसे नहीं किया जाता है और इस प्रकार उसका वेतन काट लिया जाता है। कम वेतन पाने के साथ ही यह संभव है कि यदि संशोधन मान लिया गया तो उसके वेतन में और भी कटौती कर ली जाए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, नहीं,
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ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उपाध्यक्ष महोदय, यदि बहस को घटाना है तो मैं कहने को तैयार हूं कि मुझे यह संशोधन स्वीकार्य है।
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ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 4, 16 नवम्बर, 1944, पृष्ठ 896
@ वही, पृष्ठ 902