डॉ. बी. आर. अम्बेडकर-जीवन-झाँकी - Page 23

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पानी लेने से रोकोगे?’’ यह सुनकर भीड़ खामोश हो गई किन्तु अछूतों को किले के भीतर एक सशस्त्र सैनिक के साथ ही जाने दिया गया जिससे वह ध्यान रखे कि कहीं अन्य स्थल पर जल को अपवित्र न कर दे।

डॉ. अम्बेडकर के जीवन के अनुभवों ने स्पष्ट कर दिया कि यद्यपि जातिवाद और छूआछूत हिंदू धर्म की अपनी रचना है, फिर भी भारत के मुसलमान, पारसी और ईसाई भी इस विषय पर हिंदू-धारणा से अलग नहीं है। अपने लंबे संघर्ष के दौरान, उन्हें विश्व में विद्वानों की एक ऐसी अमूल्य मित्र-मंडली मिली जो मानव-मानव के बीच जाति के आधार पर किसी को विजातीय समझ कर प्यार की भाषा से वंचित नहीं करती।

kfgf R;
Ø; kd yk

साहित्यिक क्रियाकलाप

जिसने भी डॉ. अम्बेडकर को उनके घर में देखा है, वह निश्चित रूप से उन विभिन्न विषयों के अनेक ग्रंथों को नहीं भूल सकता जो उनकी अलमारियों में भरे रहते तथा मेज के आस-पास पड़े रहते। उन्हें हर प्रकार की पुस्तकें प्रिय थीं, पर विशेष रूप से संविधान, विधि, राजनीति, अर्थशास्त्र और समाज विज्ञान संबंधी पुस्तकें अधिक प्रिय थीं। उनकी अपनी लिखी गई पुस्तकों में ‘‘रुपए की समस्या’’ (दि प्राबलम आफ रूपी)’’ ‘‘ब्रिटिश भारत में प्रांतीय अर्थव्यवस्था’’ (प्राविंशियल फाइनांस इन ब्रिटिश इंडिया) ‘‘जाति प्रथा का उन्मूलन’’ (एनिहिलेशन आफ कास्ट) ‘‘गणतंत्र बनाम आजादी’’ (फेडरेशन वर्सेज) और ‘‘पाकिस्तान पर मत’’ (थाट्स आन पाकिस्तान) शामिल हैं।ऽ

उन्होंने अछूतों की राजनीतिक जाग्रति के लिए मराठी समाचारपत्र चलाएं। वर्ष 1919ऽ में उन्होंने मुखनायक (गूंगों का नेता) का प्रकाशन आरंभ किया किन्तु ज्योंही वे यूरोप में अपनी पढ़ाई पूरी करने गए इसका स्वाभाविक अंत हो गया। वर्ष 1923/ में उन्होंने ‘अपवर्जित भारत’ (एक्सक्लूडेड इंडिया) आरंभ किया। बाद में इसका नाम बदल कर ‘जनता’ (पीपल) कर दिया गया क्योंकि उन्होंने यह महसूस किया कि इसकी अपील अपवर्जित समुदायों तक ही सीमित न रहे। धर्म के प्रति दृष्टिकोण

धर्म के प्रति डॉ. अम्बेडकर के दृष्टिकोण के संबंध में एक-दो शब्द कहना उचित होगा। यह यह महसूस करते थे कि चार जातियों में विभाजित भारतीय हिंदू सामाजिक

ऽ 1920 होना चाहिए - संपादक

@ 1927 होना चाहिए - संपादक