डा. बी. आर. अम्बेडकर जीवन-झॉकी 21
व्यवस्था, जिसमें बड़ी संख्या अछूतों की हैं, संपूर्ण देश की कमजोरी का मुख्य कारण रहा है और वे इसके दायरे में नहीं रहना चाहते थे।
कुछ वर्ष पूर्व, एक सुधारवादी हिंदू संगठन ‘‘जातिपात तोड़क मंडल’’ ने उन्हें अपने वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया। बाद में सम्मेलन रद्द हो गया क्योंकि उनके अध्यक्षीय भाषण का यह अंश मंडल को स्वीकार्य नहीं था कि एक हिंदू की हैसियत से यह उनका अंतिम भाषण होगा। उन्होंने उस अप्रसारित भाषण को ‘‘जाति का उन्मूलन’’ शीर्षक देकर एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया। इस शीर्षक से ही जाति प्रथा के बारे में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है। किन्तु यद्यपि वह हिंदू न रहने के लिए कृत-संकल्प हैं और उन्होंने कतिपय अन्य धर्मों के उपदेशों का अध्ययन किया है जिसमें बौद्ध, सिख और ईसाई धर्म भी शामिल हैं, फिर भी डॉ. अम्बेडकर अभी भी अन्य धर्म में प्रवेश की घोषणा नहीं करेंगे। उनका विश्वास है कि अभी भी अछूतों को उनकी आवश्यकता है। अभी उनके धर्म-परिवर्तन की दूरगामी प्रतिक्रिया होगी। उनकी आस्था और उनके प्रत्येक अनुयायी की आस्था ऐसा विषय है जिसे हर व्यक्ति को स्वयं सुनिश्चित करना चाहिए और इस विषय में वे अपने अनुयायियों पर अपना प्रभाव नहीं डालना चाहते। जब वे अछूतों का नेतृत्व दूसरों को सौंपेगे और जन सेवा से अवकाश ग्रहण करेंगे तब वे लोगों को अपने निर्णय की जानकारी देंगे। फिलहाल, अभी उनका अभियान चलता रहेगा।