38. युद्धोत्तर बिजली विकास - Page 240

युद्धोत्तर बिजली विकास

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लिए तैयार हैं जो निजी क्षेत्रों के लिए लाभदायक नहीं हैं। निजी क्षेत्र जब वास्तविकता थी तब इस विवाद का ठोस आधार हो सकता था। परंतु आज निजी क्षेत्र केवल एक अवस्था है। आज की अर्थव्यवस्था में वास्तविकता में कोई निजी क्षेत्र नहीं है क्योंकि उद्योग आजकल बड़ी-बड़ी पब्लिक स्टॉक कंपनियों द्वारा चलाए जाते हैं। आजकल की अर्थव्यवस्था में कोई व्यक्तिगत उद्योग नहीं रहा और उद्योगों का घोषित उद्देश्य जोखिम न रह कर सावधानी बन गया है और जहां मुख्य लक्ष्य मौजूदा आर्थिक स्थिति का लाभ बनाए रखना और व्यवस्थित अस्तित्व बनाए रखना है। मेरे लिए इस विवाद में फंसना व्यर्थ है क्योंकि सरकारी स्वामित्व और सरकारी नियंत्रण का बहुत कम विरोध है। इसलिए बिजली के मामले में अपवाद नहीं हो सकता।

मद तीन में प्रश्न उठता है कि जब किसी बिजली आपूर्ति उपक्रम का कोई लाइसेंस रद्द किया जाए तो उसे चलाने का विकल्प क्या हो। किसी बिजली प्रतिष्ठान की खरीद का सवाल। इस प्रश्न का नियमन अब भारतीय बिजली अधिनियम की धारा 7 के अधीन होता है। इस धारा के अनुसार, उसकी खरीद का पहला विकल्प स्थानीय प्राधिकरण है। उनके अनिष्छा व्यक्त करने पर प्रांतीय सरकार का स्थान है। कार्यसूची की मद तीन में प्रश्न उठाया गया है कि क्या यह उचित नहीं है कि केंद्र सरकार को भी यह विकल्प दिया जाए और यदि ऐसा हो तो किस चरण पर और किन परिस्थितियों में। प्रस्ताव है कि केंंद्र सरकार को भी खरीद का विकल्प दिया जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि बिजली जनसाधारण की सुविधा की चीज है, केंद्र सरकार को यह अधिकार देने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

प्रांत सरकार का नियंत्रण हो या केंद्र सरकार का?

दुर्भाग्यवश इस सिद्धांत को मानने में कुछ अनिष्छा है। भारत में नियोजन के मुद्दे पर दो मामलों में टकराव है - निजी उद्योग बनाम सरकार और प्रांत सरकारों का या केंद्र का नियंत्रण। हम सब इन बातों से पूरी तरह अवगत हैं, परंतु मद 3 में विशेष रूप से दूसरा मामला लिया गया है, कि उपक्रम को प्रांतीय सरकार नियंत्रित करे या केंद्रीय सरकार। जो लोग सरकारी प्रतिष्ठानों में विश्वास रखते हैं उन्हें थोड़ा सोचना होगा कि प्रतिष्ठान प्रांतीय हो या केंद्रीय और यदि प्रांतीय सरकार नियंत्रण लेने को तैयार न हो तो केंद्र सरकार यह कार्य अपने हाथ में ले ले और जहां क्षेत्रीय विकास किसी प्रांत की सीमाओं को लांघता हो तो केंद्र सरकार के विषय में विचार करना आवश्यक है। जलमार्गों की तरह बिजली भी ऐसा क्षेत्र है जो प्रांत की सीमाओं को लांघता है और यद्यपि केद्र तथा प्रांत सरकार के बीच घनिष्ठ सहयोग और तालमेल होना चाहिए, यह उचित नहीं लगता कि वहां केंद्र सरकार उन क्षेत्रों में बीच में आए जहां क्षेत्रीय विकास के लिए सरकारी नियंत्रण आवश्यक हो और प्रांत सरकार प्रतिष्ठान चलाने को सरकारी नियंत्रण के विरूद्ध हो।