216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कार्यसूची के मुद्दों पर मैंने आमतौर से जो कहा है उससे अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, समापन से पूर्व मैं इतना कहना चाहूंगा कि आपको यह ध्यान रखना कितना आवश्यक है कि जो निर्णय आप लें वह भारतीय अर्थव्यवस्था के संबंध में देश के लोकमत पर आधारित हो। यह समझ लेना एक गलती होगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कोई लोकमत नहीं है, यह मत उससे भी अधिक वाममार्गी है जितनी अनुमति हम उद्योगों के बारे में दे सकते हैं।
मैं जिस बिंदु को प्रस्तुत करने को उत्सुक हूं वह यह है कि नियोजन और लोकमत के बीच कोई समझौता होना इस देश की बड़ी आवश्यकता है जिसका आदर्श लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना है। लोग रूस में नियोजन की सफलता की बात करते हैं। परंतु वे यह भूल जाते हैं कि इस सफलता का श्रेय वहां लोकतांत्रिक सरकार का न होना है। एक संसदीय सरकार जो योजना तैयार करती है उसके सामने हर समय यह खतरा रहता है कि न जाने उसे कब अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़े और उसे भरोसा नहीं रहता कि वह इतने समय तक चल भी पाएगी या नहीं जब तक कि उसकी योजनाएं पूरी हों। क्या नियोजित अर्थव्यवस्था और संसदीय लोकतंत्र में परस्पर विरोध है, और यदि है तो दोनों के बीच किस प्रकार समन्वय स्थापित किया जाए। यह इतना बड़ा प्रश्न है कि यहां इस पर विचार नहीं हो सकता। मैं यही कहना चाहता हूं कि आप सावधानी बरतें कि यदि हमारी योजना नई सरकार के आने पर बदली न जाए तो हमें ध्यान रखना चाहिए कि योजना ऐसी हो जिसके बारे में बड़ा बहुमत यह विश्वास रखता है कि वह अधिकतम लोगों के अधिकतम हित साधन के लिए है।
समिति की सिफारिशें
‘‘लोक निर्माण और बिजली’’ पर नीति समिति ने सिफारिश की कि मौजूदा लाइसेंस क्षेत्रों की परिधि से बाहर के क्षेत्रों में बिजली विकास हेतु यथासंभव प्रयास किए जाएं और यह कार्य सरकारी उपक्रमों को सौंपा जाए। यदि किसी कारण से सरकार समुचित अवधि में उस क्षेत्र का विद्युत विकास करने के लिए तैयार न हो, तो निजी उद्यमियों को यह कार्य सौंपने से वंचित न रखा जाए। यह भी सिफारिश की गई है कि यदि जनता को सक्षम और आर्थिक संचालन का भरोसा हो तो मौजूदा लाइसेंस सामान्य नियम के अधीन जारी रखा जाए। क्षेत्रीय आधार पर बिजली विकास के मार्ग में बाधक तत्वों का उन्मूलन किया जाए चाहे वे प्रांतीय, सरकारी अथवा स्थानीय प्राधिकरण या व्यावसायिक उपक्रमों से संबद्ध हों।