भारत के खनिज साधनों पर सरकार की नीति
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निर्यात पूर्णतः रोक सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर आवश्यक रूप से एक अन्य प्रश्न पर आधारित है। वह है कि निर्यात रोकने पर क्यों उन खनिजों का आयात पूरी तरह बंद कर सकते हैं जिनका हमारे यहां अभाव है? जैसाकि माननीय सदस्य अवगत होंगे, भारत में कुछ महत्वपूर्ण खनिजों का अभाव है जैसे तेल, तांबा, सिक्का, जस्ता, टिन और गंधक। परिणामस्वरूप, निर्यात के प्रश्न पर हम इसी परिप्रेक्ष्य में विचार कर सकते हैं कि क्या हम उन वस्तुओं को मांगने में सक्षम होंगे जिनका हमारे यहां अभाव है? भारत के लिए सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि उन खनिजों का निर्यात विनियमित किया जाए जो भारत के औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक हैं और दूसरे यह देखना कि हमारे खनिज कच्चे माल के रूप में निर्यात न किए जाएं बल्कि हम अपने देश में ही ऐसे उद्योग स्थापित करें जिनमें निर्यात से पूर्व अपने माल का परिशोधन कर सकें। श्री नियोगी ने जो अन्य मुद्दा मेरे सम्मुख रखा है उसका उद्देश्य मेरा ध्यान तेल संबंधी रियायतों की ओर आकृष्ट करना है। जैसा कि श्री नियोगी अवगत हैं और मैं समझता हूं अन्य सदस्य भी अवगत होंगे, तेल निकालने की इजाजत सरकार द्वारा अभी किसी को नहीं दी जा रही, तेल की खुदाई के लाइसेंस जारी करना बंद है। यह बंदिश मुख्यतः इसलिए लगाई गई थी कि भारत सरकार नहीं चाहती थी कि विभिन्न तेल कंपनियां अपने काम में तकनीशियनों को लगा लें जिनकी इस देश में वैसे ही बहुत कमी है। यह बंदिश युद्ध तक और उसके कुछ समय तक जारी रहेगी। अब, जहां तक लाइसेंस दिए जाने का प्रश्न है, भारत सरकार अधिनियम के पास हो जाने के बाद से यह मामला प्रांतीय सरकारों के हाथ में आ गया है। परंतु प्रांतीय सरकारें अभी तक उन्हीं नियमों का पालन कर रही हैं जो इस बारे में केंद्र सरकार ने बनाए थे अर्थात ‘बंद द्वार’ की नीति। इस नीति से गैर-ब्रिटिश प्रजा पर पाबंदी लगाई गई थी, उनके लिए तेल के खनन और निकालने का द्वार बंद कर दिया गया था। किसी भी कंपनी के लिए यह शर्त थी कि लाइसेंस लेने से पूर्व उसे साबित करना होगा कि उसके कर्मचारी भारतीय हैं और बोर्ड के आधे से अधिक सदस्य ब्रिटिश प्रजा के हैं। मैं नहीं समझता कि श्री नियोगी के मन में यह प्रश्न क्यों है कि भारतीय और ब्रिटिश प्रजा के बीच भेदभाव है। मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर देने का समय नहीं है। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि इस मामले का संबंध एक और महत्वपूर्ण बात से हैं। वह है भारत सरकार अधिनियम की धाराओं III से 118 तक जिन पर सदन में अलग से विचार हो रहा है। कोयले के प्रश्न पर, जैसा मैंने कहा, इसे हमारे कानून में स्थान दिया जाएगा। इसमें घटिया कोयले का खनन, वर्गीकरण, विपणन और उपयोग शामिल है। हमारे उस कानून को सफल बनाने के लिए खान मालिकों और वसायियों का सहयोग जरूरी होगा। मैं सदन को विश्वास दिला सकता हूं कि हम इसे अपनी युद्धोत्तर नीति में शामिल करना चाहते हैं।