भारत सरकार की श्रम नीति
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है पूरा श्रम संगठन। इसी के कारण एकरूपता का अभाव है। मंहगाई भत्ते की स्वीकृति के समय क्या हुआ? श्रमिकों के विभिन्न वर्ग हैं। आपका एक संगठन है, रेलवेमैन्स फेडरेशन एक संगठन है, पोस्ट एंड टेलीग्राफ यूनियन, इसी तरह टेक्सटाइल यूनियन और दूसरे संगठन हैं और अन्य भी लोग हैं जिनका कोई संगठन नहीं है। मैं समझता हूं कि श्री जोशी सहमत होंगे कि अधिकांश श्रम संगठनों की नीति संगठित लूट के सिवाए वास्तव में कुछ और नहीं है। पहला व्यक्ति सोचता है कि वह सरकार से जितना ले सकता है ले ले, दूसरों की परवाह नहीं। एक रेलवेमेंस फेडरेशन है, जो रेलवे बोर्ड से मिलता है, अपनी राजनीति का इस्तेमाल करता है और रेलवे बोर्ड को मजबूर कर देता है कि अधिकाधिक मंहगाई भत्ता ले लिया जाए। फिर पोस्ट एंड टेलीग्राफ यूनियन है। वे लोग मेरे मित्र जो इस विभाग के प्रभारी हैं उनसे मिलते हैं। वे हड़ताल की धमकी देते हैं। वे कहते हैं कि देश की सेवा का यह सबसे आवश्यक अंग है और उतना ले लेते हैं जितना से सर्वाधिक समझते हैं। बाकी लोगों की परवाह करने वाला कोई नहीं और मैंने निश्चित रूप से कोई नहीं देखा जिसे भारतीय मजदूर कांग्रेस या अखिल भारतीय मजदूर संघ कहते हैं कि इकट्ठा होकर कोई नीति तैयार करें, जो समान रूप से सभी सरकारी कर्मचारियों के विषय में समान नीति तैयार करे।
श्री एन. एम. जोशीः क्या यह भारत सरकार का दायित्व नहीं है कि समान नीति तैयार करें?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः है, अवश्य है, बशर्ते कि हमें ऐसा करने की स्वतंत्रता हो। परंतु हर बार श्रमिकों का कोई वर्ग आ जाता है, धमकी देता है और कहता है ‘‘हम काम नहीं करेंगे और यदि आप हमें इतना नहीं देंगे तो हम हड़ताल कर देंगे।’’ सरकार इस बारे में निश्चय ही विवश है। (एक माननीय सदस्यः ‘‘आप आपस में क्यों नहीं मिलते?’’) श्री जोशी ने इस ओर ध्यान न दिए जाने का जिक्र किया है कि कई परिस्थितियों में जबरन बेरोजगारी लाद दी जाती है। यदि मैं उनकी बात को सही समझता हूं तो उन्होंने सरकार के परिपत्र की शर्तों को तिरस्कारपूर्वक देखा है जो हमने प्रांतों और मालिकों को भेजा है कि भारत सरकार का दृष्टिकोण है कि जब कोयले की कमी या कच्चे माल के अभाव में कर्मचारियों को जबरन छुट्टी दे दी जाए तो कर्मचारियों को मुआवजा दिया जाए। प्रांतीय सरकारों को लिखे गए पत्र में हमने कहा है कि भारत सरकार बेरोजगारी की इस अवधि का कुछ भुगतान करने को तैयार है। हमने उनसे कहा है कि पहले पखवाड़े में सामान्य वेतन का 75 प्रतिशत और दूसरे पखवाड़े में 50 प्रतिशत दिया जाए। यह सुविधा एक महीने तक दी जाएगी। कर्मचारी सात महीने तक ही इंतजार कर सकेगा। अंत में श्री जोशी ने कहा कि भारत सरकार ने यह देखने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं कि इन