40. भारत सरकार की श्रम नीति - Page 251

226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सुविधाओं का कर्मचारियों को वास्तव में लाभ हो। श्रीमन्, यदि श्री जोशी ने प्रांतीय सरकारों और मालिकों को लिखा गया पत्र पढ़ा होता तो उन्हें पता चल जाता कि हमने कुछ निश्चित प्रस्ताव जबरन बेरोजगारी के बारे में रखे हैं। परिपत्र में हमने कहा है कि जबरन बेरोजगारी पर दी जाने वाली सुविधाओं पर आयकर और ई पी टी का लाभ प्राप्त होगा क्योंकि इन्हें राजस्व खर्च में गिना जाएगा। मैं कह सकता हूं कि स्पष्ट रूप से पत्र में यह विशेष प्रावधान है और हम इससे अधिक की जरूरत नहीं समझते। भारत रक्षा अधिनियम के नियम 81-क में व्यवस्था है कि श्रमिकों को छूट है कि वे यदि इन परिस्थितियों में हैं तो वे प्रांतीय सरकार को आवेदन दें कि यह मामला पंच-फैसले के लिए सौंप दिया जाए। मुझे यह कहने में प्रसन्नता है कि इस दिशा में काम हो रहा है। जैसा कि माननीय सदस्य अवगत हैं, अहमदाबाद में इस विषय में पंच-फैसले की कार्रवाई चल रही है।

जो तीसरा मुद्दा श्री जोशी ने उठाया है वह कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति का है। मैं पूरी तरह उनके आरोप की गंभीरता नहीं समझ पाया कि देश में मौजूदा स्थिति में इस संबंध में क्या कमी हैं, वे वास्तव में क्या चाहते हैं? उनकी बात से मुझे ऐसा लगा कि वे समझते हैं कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है। सदन को स्मरण होगा कि कर्मचारी मुआवजा कानून में वेतन की परिभाषा बहुत विस्तृत है। इसमें केवल नकद वेतन ही शामिल नहीं है, बल्कि वह सब राशि शामिल है जो उसे मिलती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जब किसी कर्मचारी को क्षतिपूर्ति का मामला आता है तो उसे केवल वेतन ही नहीं मिलता बल्कि मुआवजा लेते समय वह वेतन के साथ मंहगाई भत्ता लेने का भी अधिकारी है। श्री जोशी ने एक बात और कही है कि ग्रेट ब्रिटेन में कानून बदल दिया गया है पर इस देश में हमने कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वहां युद्धकाल में कर्मचारी क्षतिपूर्ति के रूप में भुगतान की राशि बढ़ा दी गई है। मैंने यह मामला देखा। मुझे कहते हुए खेद है कि श्री जोशी ने अंतर को वास्तव में समझा नहीं है। जैसाकि सदन के माननीय सदस्यों को याद होगा, इंग्लैंड में कर्मचारी को मुआवजा आवधिक मिलता है जब कि भारत में भुगतान अधिकांशतः एकमुश्त किया जाता है। यह महत्वपूर्ण अंतर है। एकमुश्त भुगतान से कर्मचारी को भुगतान हुआ अैर बात खत्म हुई। उसको कोई आवधिक भुगतान नहीं करता रहाता। परंतु जहां भुगतान एक क्रमिक दायित्व है, वह अधिक समय तक किया जाता है और इसलिए स्पष्ट है कि मालिक का दायित्व भी जारी रहता है और मालिक को मंहगाई भत्ते का भुगतान करते रहना पड़ता है जैसाकि नौकरी पर लगे कर्मचारियों को किया जाता है। अंग्रेजी कानून के अनुसार बढ़ा हुआ मंहगाई भत्ता भी देना होता है। यदि सदन की ऐसी ही मर्जी है कि एकमुश्त के बजाए सावधिक भुगतान किया जाता रहे चाहे उसके जीवनकाल तक या जब तक उसके बच्चे बड़े न हो जाएं तो कोई संदेह नहीं कि जैसा इंग्लैंड में होता है यहां भी वैसा ही हो सकता है।