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भारत सरकार की श्रम नीति

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उपाध्यक्ष महोदय (श्री अखिल चंद्र दत्त)ः यह सदन की इच्छा है कि अगला प्रस्ताव रखा जाए। आप संक्षेप में बोलें।

सर कावस जी जहांगीरः नहीं, श्रीमन्, यह सदन की इच्छा बिल्कुल नहीं है। मैं इन्हें सुनना चाहता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय (श्री अखिल चंद्र दत्त)ः शांति, शांति।

यह सदन की इच्छा नहीं है। श्रीमन्, आप सदन के नाम से बोलते हैं। मैं कहता हूं जहां तक सदन के इस पक्ष का प्रश्न है, हम उन्हें सुनना चाहते हैं।

डॉ. पी. एन. बनर्जीः यहां कुछ अन्य माननीय सदस्य भी हैं जो चाहते हैं कि वे अपना भाषण समाप्त करें।

सर कावस जी जहांगीरः परंतु हम उन्हें सुनना चाहते हैं।

उपाध्यक्ष महोदय (श्री अखिल चंद्र दत्त)ः आप पूरा सदन नहीं हैं।

श्री अब्दुल कयूमः ठीक बात है।

माननीय श्री सुल्तान अहमदः श्रीमन्, आखिरकार सदन का यह पक्ष उन्हें सुनना चाहता है।

उपाध्यक्ष महोदय (श्री अखिल चंद्र दत्त)ः दिक्कत कहां हैं? मैं कह रहा हूं कि यह अध्यक्ष की व्यवस्था नहीं है, यह तो माननीय सदस्य के अध्यक्ष का अनुरोध ही है और यह उन पर है कि वे इसे स्वीकार करें या न करें।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः श्रीमन्, माननीय श्री जोशी ने जो अगला मुद्दा उठाया है वह तकनीकी कार्मिक अध्यादेश के बारे में है। उन्होंने कहा है कि यह तकनीकी कार्मिक अध्यादेश नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच असमानतापूर्ण व्यवहार के सिद्धांत पर आधारित है। यहां यह मुद्दा उठाया गया है कि तकनीकी कार्मिक अध्यादेश के अनुसार कोई कर्मचारी सेवा से त्यागपत्र देने के लिए स्वतंत्र नहीं है जब कि उसी अध्यादेश के अंतर्गत कोई मालिक किसी कर्मचारी को हटाने के लिए स्वतंत्र है। श्रीमन्, मैं वस्तुस्थिति बताना चाहता हूं जो इस अध्यादेश को पढ़ने पर पता चल जाएगी। वास्तविकता यह है कि यदि कोई कर्मचारी त्यागपपत्र देना चाहता है तो उसे मालिक की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अध्यादेश में कहा गया है कि यदि कोई कर्मचारी त्यागपत्र देना चाहता है तो वह न्यायाधिकरण से अनुमति ले। कर्मचारी को हटाए जाने की जो बात है उसमें भी स्थिति यह है कि नियमानुसार जब तक वह न्यायाधिकरण की अनुमति न ले ले। वह किसी कर्मचारी को न तो हटा सकता है और न ही बर्खास्त कर सकता है। इसका निस्संदेह एक अपवाद है