खानों में महिलाओं को भूमिगत काम देने पर से हटाए गए प्रतिबंध
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अखिल भारतीय महिला सम्मेलन भारत सरकार के उस फैसले के विरूद्ध आंदोलन जारी रखता कि महिलाओं की कोयला खानों में नियुक्ति रोक दी जाए। मैं यह नहीं कहता कि अखिल भारतीय महिला सम्मेलन ने जो अपना रवैया बदला उसके पीछे कोई दुर्भाव था, परंतु मैं कह सकता हूं कि मैं इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि इस साल के भीतर लोगों के नैतिक और राजनैतिक विचारों में इतना क्रांतिकारी बदलाव हो गया कि वे उस कार्य को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है जो आपात स्थिति समाप्त होते ही समाप्त हो जाएगा।
श्रीमन्, मुझे बताया गया है कि कोयला खानों के अंदर काम करने वाली स्त्रियों की संख्या केवल 15000 है और वे अधिक कोयला उत्पादन करने में असमर्थ रही हैं। तब भारत सरकार 15000 को भूमिगत कार्यों पर लगाने पर क्यों जोर देती है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। पहली बात तो यह .............
श्री सामी वेंकटचलम चेट्टीः क्या मैं जान सकता हूं कि माननीय श्रम सदस्य कोई पक्का आश्वासन देंगे कि वे उन्हें काम पर लगाए रहेंगे, चाहे लोकमत कुछ भी क्यों न हो?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः यदि माननीय सदस्य के विचार मेरे प्रति ऐसे दुर्भाग्यवश हैं, तो मैं कुछ नहीं कर सकता। उन्हें अधिकार है कि वे मेरे बारे में जो चाहें सोचें और मुझे भी स्वतंत्रता है कि मैं उनके विषय में अपनी राय रखूं। मैं नहीं समझता कि हमें सदन में अपनी राय प्रकट करनी चाहिए।
प्रश्न यह है कि हम महिलाओं को भूमिगत कार्यों में क्यों लगाते हैं। इसके तीन कारण हैं। पहली बात तो यह कि इन परिस्थितियों का अहसास किया जाए जिनमें हम आज हैं। हम उनके भूमि के नीचे काम करने को महज उसकी एक इकाई के रूप में नहीं देख सकते। उसमें एक संभाव्यता है, यदि वह काम के लिए जाती है.......
अध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः माननीय सदस्य का समय समाप्त हो चुका है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं 20 मिनट से अधिक नहीं बोला हूं।
पहला परिणाम तो यह होगा कि यदि स्त्रियां कोयला खदानों से चली जाएंगी तो कोयला काटने वाले कटर भी खान छोड़ देंगे और स्थिति और भी बिगड़ जाएगी। दूसरा परिणाम यह होगा कि कोयला खानों में उपस्थिति और कम हो जाएगी। और तीसरे, कोयला कटर और भी कम हो जाएंगे क्योंकि कोयला कटरों को ढलाई का