कारखाना (दूसरा संशोधन) विधेयक
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सही परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाएगा। प्रवर समिति का विचार था कि यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मामला है कि विधेयक में इसका प्रावधान किया जाए। तदनुसार, प्रावधान कर दिया गया है।
विधेयक में एक अन्य नया सिद्धांत प्रस्तुत किया गया है। वह है कि जो कर्मचारी अपना अवकाश नहीं ले सका है या उसको अवकाश के बदले वेतन नहीं मिल पाया है, तो कर्मचारी के हित रक्षण के लिए निरीक्षक को अधिकृत किया गया है। प्रवर समिति ने अहसास किया कि उसे अपने काननू लाभ प्राप्त करने के लिए अपने मालिक पर जो उसे लाभ उपलब्ध कराने में विफल रहा है फौजदारी या दीवानी का मुकदमा अपने खर्च से चलाने की आवश्यकता नहीं है। यह सरकार का दायित्व है कि वह देखे कि कर्मचारी को लाभ मिले। अब निरीक्षक को अधिकार देने से यह संभव होगा कि वह कर्मचारी की ओर से कदम उठा सकेगी।
एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन जो प्रवर समिति ने किया है वह नियम बनाने से संबंधित है। माननीय सदस्यों को याद होगा कि मूल विधेयक में नियम बनाने के अधिकार प्रांतों पर छोड़ दिए गए थे। अब प्रवर समिति मेंं यह अनुभव किया है कि यदि नियम बनाने के अधिकार विभिन्न प्रांतीय सरकारों पर छोड़ दिए जाएंगे तो वे भिन्न-भिन्न नियम बनाएंगी_ इससे एक ही अधिनियम के भिन्न-भिन्न नियम हो जाएंगे और इसका विभिन्न उद्योगों पर निस्संदेह गंभीर प्रभाव पड़ेगा। एक राज्य में किसी उद्योग पर कोई नियम लागू है, तो दूसरे राज्य में अलग नियम लागू होंगे और पूरे भारत के परिप्रेक्ष्य में यह अवांछनीय होगा। इसलिए प्रवर समिति ने सिफारिश की है कि नियम बनाने के बारे में भारत सरकार को चाहिए कि वह प्रांतीय सरकारों के नियमों के संबंध में निर्देश दे ताकि एकसमान नियम रचना की इच्छा और उद्देश्य की पूर्ति हो सके। प्रवर समिति में विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप ये कुछ बुनियादी सिद्धांत विधेयक में शामिल किए गए हैं शेष प्रावधान कुल मिलाकर ऐसे ही हैं जो मूल विधेयक में थे और उन पर टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। श्रीमन्, मैं प्रस्ताव प्रस्तुत करता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय (श्री अखिल चंद्र दत्त)ः प्रस्ताव प्रस्तुत हुआः
‘‘कि कारखाना अधिनियम, 1934 में और संशोधन करने वाले विधेयक पर, प्रवर समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में, विचार किया जाए।’’
ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं नहीं समझता कि मेरे लिए यह आवश्यक है कि मैं उन सभी मुद्दों पर बोलूं जो इस विधेयक पर सदस्यों ने उठाए
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 3, 29 मार्च, 1945, पृष्ठ 2276