248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं, खासतौर से इसलिए कि मैंने देखा है कि वह प्रत्येक मुद्दा संशोधन के अधीन आ जाता है। परिणामस्वरूप, बहस दुबारा हो जाएगी जो मैं नहीं चाहता। मुझे जो कहना होगा तभी कहूंगा जब विभिन्न मुद्दों पर यथोचित संशोधन पेश किया जाएगा।
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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः श्रीमन्, मैं समझता हूं कि उन संशोधनों को स्वीकार करना संभव नहीं है कि जो श्री जोशी अथवा प्रोफेसर रंगा ने पेश किए हैं। मैं बिल्कुल समझता हूं कि यदि किसी कर्मचारी ने वांछित सेवा काल पूरा कर लिया है तो उसे छुट्टियों का अधिकार प्राप्त हो, चाहे उसने एक मालिक की नौकरी की हो अथवा अधिक की। परंतु दो तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। पहला है प्रशासनिक व्यावहारिता। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिन मामलों में बीमे की राशियों का भुगतान मालिक द्वारा किया जाना है और उसके प्रयोजन के लिए कोई कोष बना हुआ है, उस दशा में, यदि मैं अपने मित्रों का संशोधन स्वीकार कर लूं, तब इस प्रावधान की क्रियान्वित संभव नहीं होगी। उदाहरण के लिए, यदि स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की जाती है तो उसका आधार कार्ड टिकट प्रणाली या कोई अन्य प्रशासनिक व्यवस्था होगी और तब उनका संशोधन स्वीकार करना संभव होगा। परंतु फिलहाल मेरा कहना है कि मुझे इस संशोधन को स्वीकार करने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।
मेरा निवेदन है कि सदन अथवा प्रवर समिति की इच्छा थी कि विधेयक के लागू होने की कोई तिथि निश्चित कर दी जाए। मेरे माननीय मित्रों को याद होगा कि मूल विधेयक में हमने इसके परिपालन की तिथि प्रांतों पर छोड़ दी थी। परंतु हमने उस प्रक्रिया को त्याग दिया है और यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया है कि इस विधेयक में ही उस तिथि का उल्लेख कर दिया जाए जब से इसे लागू किया जाना है। इस विधेयक में वह तिथि पहली जनवरी, 1946 निश्चित की गई हैं इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस विधेयक के परिपालन के लिए जिस तंत्र की आवश्यकता है वह पहली जनवरी तक या इससे पूर्व स्थापित कर दिया जाए। किन्तु मैं स्वीकार करता हूं कि भारत सरकार अथवा प्रांतीय सरकारें ऐसी व्यवस्था स्थापित करने में असमर्थ हैं जो इन दोनों संशोधनों द्वारा अपेक्षित हैं। जैसा कि मैंने कहा है, मेरी इस पर सहमति हैं, परंतु प्रशासनिक कठिनाइयां इतनी अधिक हैं कि इस समय मुझे इस संशोधन का विरोध करना पड़ेगा।
प्रोफेसर एम. जी. रंगाः क्या मैं एक सुझाव रख सकता हूं? यदि यह सरकार को स्वीकार्य हो तो, अन्यथा नहीं। यदि हम प्रस्तावित संशोधन की पहली पंक्ति
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 3, 29 मार्च, 1945, पृष्ठ 2280