कारखाना (दूसरा संशोधन) विधेयक
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से शब्द ‘‘अथवा विविध प्रबंधों’’ हटा दें और केवल इतना रहने दे ‘‘अथवा उन्हीं प्रबंधकों के कारखाने’’।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मेरे लिए इस सब में कठिनाई है, मैंने इस पर गौर कर लिया है।
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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (श्रम सदस्य)ः अध्यक्ष महोदय, मैं नहीं समझता कि जिन्होंने ये संशोधन प्रस्तुत किए हैं अथवा इनका समर्थन किया है उन्होंने कोई बहुत न्यायसंगत कार्य किया है। हमारे मानक उपाय वही रहे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलनों में स्वीकार किए गए हैं और सदन को स्मरण होगा कि इस अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में रखा जाना है। उस दृष्टिकोण से देखने पर मैं स्वीकार नहीं करता, न ही कह सकता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन ने जो मानक निर्धारित किया है प्रस्ताविक विधेयक में उससे कम की व्यवस्था है। अपनी ओर से मैं एक और कठिनाई का उल्लेख करूंगा। माननीय सदन को याद होगा कि श्रम कानून बनाने का विषय समवर्ती सूची में है। इन उपायों को कार्यान्वित कराना प्रांतीय सरकारों के अधीन है जिनके लिए प्रशासनिक अधिकारी की संविधान में व्यवस्था है। इसके अनुसार एक परंपरा स्थापित हुई है कि जहां तक समवर्ती कानूनों का प्रश्न है, उन पर हम जो भी उपाय करें उन पर प्रांतीय सरकारों की सहमति होनी चाहिए। मैं सदन को बताना चाहूंगा कि जो समयावधि निर्धारित की गई है वह प्रांतीय सरकारों से परामर्श करने के बाद नियत की गई है। फिर भी मैं संशोधन को स्वीकार करने को तैयार हूं और मैं उसका कारण बताना चाहूंगा। जो इस संशोधन को स्वीकार करने के विषय में मेरे विचार में आया। मेरी समझ में जो कारण आया है वह भौगोलिक कारण है। मैं अहसास करता हूं कि औद्योगिक केंद्रों और जनसंख्या स्रोतों में बहुत फासला है। एक फैक्ट्री बंबई में लगाई गई है, श्रमिक संयुक्त प्रांत अथवा मध्यप्रांत में रहते हैं और उन्हें काम के लिए दूर आना पड़ता है। इस परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कि उन्हें लंबी यात्रा करनी पड़ती है, मैं सोचता हूं कि शायद एक छोटा सा अंतर प्रस्तावित विधेयक में लाया जा सकता है। इसी आधार पर मैं संशोधन स्वीकार करने को तैयार हूं। साथ ही मैं एक और शर्त रखता हूं। मैंने देखा है कि प्रो. रंगा और श्रीमती सुब्बारायन के नाम से एक अन्य संशोधन है जिसका उद्देश्य ‘‘कम से कम’’ शब्द जोड़ने का है, जिसे प्रवर समिति ने हटा दिया था। इन शब्दों को विसंगति उत्पन्न होगी। मैं ऐसे मामलों में एकरूपता के सिद्धांत को बुनियादी मानता हूं और इसलिए मेरी स्थिति यह है कि जिन्होंने यह संशोधन किया है वे, मैं आशा करता हूं, इसे त्यागने पर सहमत हो जाएंगे। मैं ‘‘दस दिन’’ वाला संशोधन मानने के लिए तैयार हूं।
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 4, 2 अप्रैल, 1945, पृष्ठ 2315-16