1. श्रम संबंधी कानून में एकरूपता - Page 29

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किन-किन बातों में यह अधिवेशन पूर्व अधिवेशनों से भिन्न है। पहली बात तो यह है कि यद्यपि पूर्व अधिवेशन नियमित रूप से एक निश्चित अंतराल के पश्चात् होते रहे हैं, उन अधिवेशनों में स्थायित्व की कोई योजना नहीं थी। उनकी योजनाओं का क्रम टूट सकता था और किसी नियम या प्रथा को क्षति पहुंचाए बिना अथवा किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले ही मुद्दे त्याग दिए जाते थे। वर्तमान अधिवेशन की योजना में स्थायित्व निहित है। जिस संगठन की स्थापना हम करना चाहते हैं उसमें स्थायी और नियमित रूप से काम करने वाली समिति होगी और जब भी उसे काम सौंपा जाएगा उसे करने को तत्पर रहेगी।

अधिवेशन की इस विशेषता से अधिक महत्वपूर्ण दूसरी विशेषता है जिसकी ओर मैं खास तौर पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। यह अधिवेशन के गठन की बाबत है। पूर्ववर्ती अधिवेशन केवल सरकार का प्रतिनिधित्व करते थे - उनमें केंद्रीय सरकार, प्रांतीय सरकारों और कुछ भारतीय राज्यों के ही प्रतिनिधि होते थे। इन अधिवेशनों में अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण तत्वों, अर्थात नियोजकों और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व नहीं होता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि नियोजकों और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों से संपर्क किया गया था। उदाहरण के लिए जब हमारे विशिष्ट सहयोगी माननीय ए. रामास्वामी मुदलियार श्रम विभाग के प्रभारी सदस्य थे, तो वह कलकत्ता गए थे और वहां नियोजकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से मिले थे।

इसी प्रकार, हमारे प्रतिष्ठित साथी माननीय सर फिरोज खान नून ने जिनके बल पर वर्तमान अधिवेशन की परियोजना टिकी है, श्रम सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान नियोजकों और कर्मचारियों के संगठनों से विचार-विमर्श करने का अवसर निकाला। तथापि श्रम संबंधी अधिवेशनों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि संयुक्त अधिवेशन में नियोजकों और कर्मचारियों को आमने-सामने लाकर खड़ा किया गया है। मेरे विचार से अधिवेशन की यह ऐसी विशेषता है जिसका प्रत्येक दृष्टिकोण से स्वागत होना चाहिए, विशेष रूप से कर्मचारियों के प्रतिनिधियों की ओर से। जब से विटली आयोग ने भारत में श्रम की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट में यह प्रस्ताव रखा है कि भारत में औद्योगिक परिषद के रूप में एक स्थायी निकाय की स्थापना की जानी चाहिए तभी से हम सिफारिश को लागू कराने के लिए श्रमिक प्रतिनिधियों ने आंदोलन चलाया है। विभिन्न कारणों से, अब तक औद्योगिक परिषद की अवधारणा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। मैं यह दावा नहीं करता कि इस सम्मेलन से जिस प्रस्ताव को लागू करने के लिए कहा जा रहा है उससे उस महत्वपूर्ण अवधारणा का पूर्ण कार्यान्वयन होता है। परंतु मुझे विश्वास है कि यह सम्मेलन उस लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक मार्ग बनाने का काम करता है, और यदि मैं यह कहूं कि