श्रम संबंधी कानून में एकरूपता
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उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह एक लंबी छलांग है तो आप इसे अतिशयोक्ति नहीं कहेंगे।
श्रम सम्बन्धी विधान
अब मैं अधिवेशन के उद्देश्यों और लक्ष्यों के बारे में दो शब्द कहूंगा। आप में से कुछ लोग जो पिछले अधिवेशनों से परिचित हैं जानते होंगे कि जिन उद्देश्यों को लेकर इन अधिवेशनों का आयोजन किया गया उनमें से एक मुख्य उद्देश्य यह था कि श्रम संबंधी विधान में बिखराव न हो क्योंकि श्रम संबंधी विधान में प्रांतीय स्वतंत्रता के कारण यह समस्या देश के सामने पहले से ही चली आ रही थी।
चूंकि भारत सरकार संघात्मक सरकार है, इसलिए श्रम विधान में एकरूपता लाना कठिन कार्य नहीं है। भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा जो गणराज्यीय संरचना की गई, जिसके द्वारा श्रम विधान को समवर्ती सूची में शामिल किया गया, उससे गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई। यह आशंका व्यक्त की गई कि यदि कोई केंद्रीय विधान न बनाया गया तो प्रत्येक प्रांत अपनी सुविधानुसार विशेष प्रकार से विधान बनाएगा जो पड़ोसी प्रांत के लिए कठिनाई पैदा करेगा क्योंकि ऐसा करने से सामान्य एवं राष्ट्रीय महत्व के तथ्यों की अपेक्षा प्रांतीय महत्व पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।
तीन मुख्य उद्देश्य
बुलाए गए सम्मेलनों से आग्रह किया गया था कि ऐसा उपाय करें जिससे इस प्रवृत्ति में सुधार हो और प्रांतीय सरकारों के मन में श्रम विधान की बाबत पूर्ण एकरूपता का सिद्धांत बैठ जाए। इस सम्मेलन का गठन करते हुए मैं यह नहीं चाहता कि श्रम विधान में एकरूपता का उद्देश्य त्याग दिया जाए जिसके बारे में पिछले तीन सम्मेलनों में मुख्य रूप से चिंता व्यक्त की गई है। यह ऐसा उद्देश्य है कि जिस पर सम्मेलन जोर देगा। किन्तु इसके साथ में दो उद्देश्य और जोड़ना चाहता हूं अर्थात औद्योगिक विवादों के सुलझाने की प्रक्रिया निर्धारित करना तथा अखिल भारतीय महत्व के सभी मामलों पर जो श्रमिक और मालिकों के बीच हैं चर्चा करना। इसलिए हमारे सम्मेलन के तीन मुख्य उद्देश्य होंगे -
(i) श्रम संबंधी विधानों में एकरूपता को बढ़ावा देना,
(ii) औद्योगिक विवादों के निपटारे की प्रक्रिया निर्धारित करना_ और
(iii) कर्मचारियों और नियोजकों के बीच के अखिल भारतीय महत्व के मामलों
पर विचार-विमर्श करना।
प्रथम मुद्दे के संबंध में यह कहना व्यर्थ है कि हमने इसे अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों में क्यों शामिल किया। भारत जैसे विशाल देश में जहां प्रशासनिक और प्रांतीय