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श्रमिकों के प्रति सरकारी दायित्व

सरकार का दायित्व

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इस सम्मेलन के समक्ष जो विचारणीय समस्याएं हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है श्रमिक कल्याण और मालिकों व श्रमिकों के संबध। इस परिप्रेक्ष्य में सम्मेलन अपने काम से अवगत है। मैं सोचता हूं कि इस अवसर का जो उपयोग मैं करूंगा वह है एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करना ताकि हमें इस बात का सही अनुमान हो कि हमने अपने क्षेत्र में क्या किया है और क्या करना बाकी है।

लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के उद्देश्य से मैं पहले अपने दायित्वों से आरंभ करूंगा। हमारे दायित्व कई दिशाओं में हैं। ये श्रमिकों के लिए रॉयल श्रम आयोग की सिफारिशों से उत्पन्न हुए हैं जो 1930 में दी गई थीं। हमारे दायित्वों का दूसरा स्रोत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, जिसका भारत शुरू से ही सदस्य है, के कंवेंशन हैं।

रॉयल श्रम आयोग ने 357 सिफारिशें की थीं। इस दुर्जेय संख्या से पता चलता है कि भारत 1929 में श्रम कानूनों के क्षेत्र में अन्य देशों से कितना पीछे था। इन 357 सिफारिशों में से (पूर्ण और आंशिक) 133 के लिए कानून बनाना है। सरकार ने इन 133 में से 126 स्वीकार कर ली हैं। स्वीकृत 126 में से केवल सात को अस्वीकार किया गया। 106 पर कार्यवाही की गई। अब केवल 20 विचाराधीन हैं। इन 20 में से 10 का संबंध कार्यशाला के लिए कानून बनाने से हैं। कारखाना अधिनियम की धारा 5 के अनुसार इनका विवेकाधीन अधिकार प्रांतीय सरकारों का है। इस प्रकार, दरअसल केवल 10 सिफारिशें बची हैं। इस संबंध में हमारा दायित्व बहुत कम है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के कंवेंशन

‘‘दूसरे स्रोत के दायित्व के सवाल पर यह पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 1919 से 1943 तक श्रम संबंधी विभिन्न विषयों पर कुल 63 कंवेंशन स्वीकार किए हैं। भारत ने केवल 14 की पुष्टि की है और 49 की पुष्टि करनी है।’’

अब आपके सामने स्थिति का ब्यौरा उपस्थित है। रॉयल श्रम आयोग पर हमारा काम अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के कंवेशनों की अपेक्षा बेहतर है। दरअसल यह संभावित था क्योंकि रॉयल श्रम आयोग की सिफारिशें भारतीय परिस्थितियों के अधिक अनुकूल हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की सिफारिशें सामान्य श्रेणी की हैं।

‘‘वास्तविकता यह है कि रॉयल आयोग की सिफारिशों के दृष्टिकोण से हमारा दायित्व नगण्य है, कंवेंशनों की पुष्टि से यह विशाल है। जिन कंवेशनों की पुष्टि नहीं हुई है उनमें से कुछ बहुत महत्वपूर्ण हैं और हमारे लिए आवश्यक है कि उनको बहुत सावधानी से अध्ययन करें और अपने श्रमिकों का स्तर ऊंचा उठाएं जैसाकि