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श्रमिकों के प्रति सरकारी दायित्व

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वहां के लोगों से यह कहना अनुचित नहीं कि अंतरिम काम में वेतनों में और जीवन स्तर में कमी कर दें ताकि उद्योग पनप सकें। यह जानकार श्रमिकों को क्षोभ नहीं होगा कि आखिर उद्योग सरकार के ही हैं ओर उसे सरकार की सम्पन्नता में हिस्सा मिलता है। ऐसी अर्थव्यवस्था में श्रमिक जीवन स्तर और वेतन घटाने पर क्यों सहमत हो जाएगा जहां लाभ कुछ व्यक्तियों की जेबों में जाता हो। मुझे विश्वास है कि आप मानेंगे कि इस बात में वजन है।

श्रम कल्याण के लिए धन

श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए हमारे पास समुचित व्यवस्था नहीं है, यह तर्क भी कोई ठोस दलील नहीं है। श्रमिक कई प्रकार से इसकी धज्जियां उड़ा सकते हैं और हर बिंदु पर आप अपने को लाचार पाएंगे। सरकार कानून और व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा पुलिस बल रखती है। कर संग्रह के लिए राजस्व कर्मचारी रखती है। श्रमिक कह सकते हैं कि सरकार का कर्तव्य केवल कर संग्रह और कानून की अवज्ञा करने वालों को सजा देना ही है? क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं है कि वह सेवा की शर्तों का पालन कराने के लिए भी ऐसी व्यवस्था करे जो सभ्य जीवन के अनुरूप हो? यदि सरकार का यह कर्तव्य है, तो क्या सरकार इसके लिए बाधित नहीं है कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करे और उसे चलाए? व्यवस्था के अभाव का तर्क आधारहीन है।

‘श्रम कानूनों पर आने वाले खर्च की क्षमता के विषय में जो तर्क है वह महत्वपूर्ण है और श्रमिकों को इस पर ध्यान देना होगा। साथ ही इस तर्क के पीछे विश्वास का प्रश्न भी है। क्या यह जायज तर्क है? या यह जिम्मेदारी से हाथ खींच लेने का बहाना मात्र है। श्रमिक कहेंगे कि लागत का तर्क बेदम है, क्योंकि युद्ध पर कितना धन खर्च हुआ? हम सभी जानते हैं कि युद्ध के लिए विशाल धनराशि एकत्र की गई और धनवानों की कमर पर युद्ध करों का कितना भारी बोझ लादा गया।’

श्रमिकवर्ग राजनीतियों से पूछ सकता है कि यदि युद्ध पर हुआ खर्च जन-कल्याण पर किया जाता है तो कितने बेघर लोगों को अच्छे आवास दिए जा सकते थे, कितने नंगे बदनों को ढंग के वस्त्रों से ढका जा सकता था, कितने भूखे पेटों की आग बुझाई जा सकती थी, कितने निरक्षरों को शिक्षित किया जा सकता था, कितन बीमारों का इलाज कराया जा सकता था? श्रमिक धनवानों से पूछ सकते हैं जब युद्ध का खर्च उठाने पर आपको मलाल नहीं हुआ तब श्रमिकों का जीवन स्तर उठाने पर आने वाले खर्च से क्यों नाक भौं सिकोड़ते हों? मैं सोचता हूं इन सवालों का जवाब हंसी

खेल नहीं है।