298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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ऽकारखाना (संशोधन) विधेयक
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः (श्रम सदस्य)ः अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूंः
‘‘कि कारखाना अधिनियम, 1934 में और संशोधन करने वाले विधेयक पर
विचार किया जाए।’’
विधेयक में कुल मिलाकर सात खंड है, परंतु इन सात में से केवल दो प्रमुख हैं। वे हैं विधेयक के खंड 2 और खंड 7 । ये दोनों, पृथक-पृथक बातों से संबंधित हैं। खंड 2 का संबंध काम के घंटों से है और खंड 7 का समयोपरि भुगतान की दर से।
पहले, काम के घंटों में कमी को लेते हैं। मैं सदन को बताना चाहता हूं कि वास्तविक स्थिति क्या है। मौजूदा स्थिति यह है कि कारखानों अधिनियम की धारा 34 के अनुसार पूरे साल चलने वाली फैक्ट्रियों में काम के अधिकतम घंटे 54 प्रति सप्ताह निर्धारित किए गए हैं और पूरे साल न चलने वाले अर्थात मौसमी कारखानों में यह संख्या 60 घंटे प्रति सप्ताह है। विधेयक के खंड 2 में प्रस्ताव है कि धारा 34 के अनुसार पूरे साल चलने वाले कारखाने में काम के अधिकतम घंटे 48 नियत किए जाएं और मौसमी फैक्ट्री में अधिकतम 54 घंटे नियत किए जाएं। सदन को यह बनाया आवश्यक है कि सरकार ने यह संशोधन क्यों जरूरी समझा।
सदन के कुछ सदस्यों को स्मरण होगा कि कारखानों में काम के घंटों का प्रश्न पहली बार 1919 में वाशिंगटन में हुए सम्मेलन में उठा था। सम्मेलन ने कारखाना श्रमिकों के लिए काम के अधिकतम घंटे 40 नियत किए थे, परंतु भारत की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सम्मेलन इस बात पर तैयार हो गया था कि यहां काम के घंटों की अधिकतम सीमा 60 रखी जाए जो एक समय लागू थी। परिणामस्वरूप भारत सरकार ने 60 घंटों को जारी रखने की अनुमति दे दी। तब
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 1, संख्या 7, 21 फरवरी, 1946, पृष्ठ 1304-6