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कारखाना (संशोधन) विधेयक

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रॉयल श्रम आयोग ने इस मामले की जांच की और कहा कि हालांकि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ने भारत सरकार पर ऐसा कोई दायित्व नहीं डाला था कि वह वाशिंगटन सम्मेलन के अनुरूप फैक्ट्री कानून बनाए फिर भी इस आयोग ने सिफारिश की कि यह जरूरी है कि भारत में काम के घंटों की संख्या 54 रखी जाए। भारत सरकार ने वह सिफारिश स्वीकार कर ली और 1934 में संशोधन विधेयक लाया गया जिसके अधीन धारा 34 में मौजूदा अवधि लागू हुई। भारत सरकार का विचार है कि अब समय और परिस्थितियां आ गई हैं कि यह जरूरी है कि भारत के फैक्ट्री कर्मचारियों को वाशिंगटन सम्मेलन के काम के घंटों का लाभ दिया जाए और यही कारण है कि यह विधेयक लाया गया है।

मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि भारत सरकार इस विषय में इतना तात्कालिक क्यों समझती है। परंतु मैं संक्षेप में यह बताना चाहता हूं कि ऐसे क्या कारण हैं जिनके परिणामस्वरूप भारत सरकार ने यह कदम उठाया। मैं समझता हूं कि इस बात पर सहमति होगी कि अन्य कारणों के अतिरिक्त किसी कारण पर विचार किया जाना चाहिए तो वह है भारत की जलवायु की परिस्थितियां। इस बात पर सहमति होगी कि भारत जैसे देश में अन्य देशों की अपेक्षा काम के घंटे कम होने चाहिएं। एक अन्य कारण यह है कि युद्ध के दौरान जारी अध्यादेश की धारा 8 के अनुसार हमने प्रांत सरकारों को काम के घंटे बढ़ाए जाने की छूट दे दी थी। श्रमिक वर्ग और भारत सरकार सोचती है कि युद्ध के दौरान काम के घंटे बढ़ाए जाने से जो मेहनत मजदूरों पर बढ़ी वह इतनी ज्यादा है कि सरकार श्रमिकों के स्वास्थ्य के हित में यह आवश्यक समझती है। इस कदम से बेरोजगारी कम करने पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ेगा जिसकी कि छंटनी के कारण आशंका है। यदि 48 घंटे और 54 घंटे जो मौजूदा विधेयक में निश्चित किए गए हैं ..........

श्री वी.एन. गाडगिल (बंबई केंद्रीय डिवीजनः गैर-मुस्लिम ग्रामीण)ः इसे 40 कर दें।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः .................सब जगह लागू किए जाएं तो मैं निश्चय ही उससे अधिक लोग काम पर आएंगे जितने कि इस समय आ रहे हैं और कुछ हद तक हमारी युद्धोपरांत कठिनाइयों में राहत मिलेगी। कुछ सदस्य शायद सोच रहे हों कि यह बहुत ही बुनियादी परिवर्तन लाने वाला कदम है। मैं उनकी इस धारणा को दूर करना चाहूंगा। फिलहाल जो चल रहा है उसमें इस विधेयक से कोई बुनियादी परिवर्तन आने वाली नहीं है। मैं सदन में कुछ आंकड़े पेश करना चाहता हूं, यह बताने के लिए कि साल भर चलने वाले कारखानों में 48 घंटे और मौसमी कारखानों में 54 घंटे की सीमा बांधना किस हद तक समय की पुकार बन गई है।