56. कारखाना (संशोधन) विधेयक - Page 325

300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं 1939 केसाल भर चलने वाले कारखानों की संख्या बता रहा हूं, वे कुल मिलाकर 8,644 थे और उनमें से 2315 कारखाने 48 घंटे प्रति सप्ताह काम ले रहे थे अर्थात 27 प्रतिशत कारखाने। 1940 में कारखानों की संख्या 8115 थी और जो 48 घंटे प्रति सप्ताह काम ले रहे थे उनकी संख्या 2525 थी अर्थात 28 प्रतिशत। 1941 में कारखानों की संख्या 10261 थी और जो 48 घंटे काम लेते थे वे 2921 थे अर्थात 29 प्रतिशत। 1942 में उनकी कुल संख्या 10483 थी और 48 घंटे काम लेने वालों की 2687 अर्थात् 26 प्रतिशत। 1943 में कुल 11239 कारखानों में से 48 घंटे काम लेने वालों की संख्या 2761 थी अर्थात 25 प्रतिशत। 1944 में 11835 कारखानों में 48 घंटे काम कराने वाले 3191 अर्थात 27 प्रतिशत थे। मौसमी कारखानों के बारे में भी ऐसे ही तथ्य निम्न प्रकार हैंः 1939 में इनकी संख्या 6522 थी, इनमें से 2409 में 54 घंटा प्रति सप्ताह की दर पर काम हुआ, अर्थात 39 प्रतिशत में। 1940 में कुल 6239 कारखानों में से 2440 में 54 घंटे काम लिया जाता था। प्रतिशत इतना ही था। 1941 में यह संख्या 6265 थी, इनमें से 54 घंटे काम कराने वाले 2439 थे जिनका प्रतिशत 39 ही था। 1942 में 5925 में से 54 घंटे काम लेने वाले 2358 कारखाने थे। यह संख्या 40 प्रतिशत बैठती है। 1943 में इनका योग 6255 था, इनमें से 2398 में 54 घंटे काम लिया गया। यह संख्या 40 प्रतिशत बनती है। 1944 में, 5950 कारखानों में से 2368 ने 54 घंटे काम किया। यह 40 प्रतिशत बैठता है। ( एक माननीय सदस्यः ‘‘बाकी में 54 घंटों से अधिक’’) अधिकतम से ऊपर नहीं, परंतु इस विधेयक में निर्धारित घंटों से अधिक।

श्री श्रीप्रकाश (बनारस और गोरखपुर डिवीजनः गैर-मुस्लिम देहात) कामगारों की संख्या क्या है?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं इस पर आ रहा हूं। कामगारों की संख्या के बारे में दुर्भाग्य से हमारे पास संपूर्ण आंकड़े नहीं है। परंतु हाल ही में भारत सरकार द्वारा नियुक्त तथ्यान्वेषी समिति की रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या इस प्रकार हैः मौसमी और गैर-मौसमी सभी फैक्ट्रियों में कर्मचारियों की वर्ष 1945 की कुल संख्या 25,20,251 है। जो कर्मचारी 48 से 54 घंटे काम करते हैं, उनकी संख्या 9,47,000 है जो 37 प्रतिशत बैठती है। इसलिए यह देखा जा सकता है कि पूरे साल चलने वाली और मौसमी फैक्ट्रियों में से बहुतों ने विधेयक में नियत काम के अधिकतम घंटे पहले ही लागू कर रखे हैं और इस दृष्टिकोण से यह नहीं कहा जा सकता कि विधेयक मौजूदा स्थिति में कोई बड़ा बुनियादी परिवर्तन कर रहा है।

एक और मुद्दा जो विधेयक के आलोचकों ने उठाया है जिसका उल्लेख मैं अपने उत्तर में करूंगा। कहा गया है कि इस विधेयक से उत्पादन पर असर पड़ेगा -