302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि प्रांतीय सरकारों को अधिकार दिए गए हैं कि वे आदेश की अवधि एक बार छह महीने बढ़ा सकती है - यदि यह प्रमाणित हो जाए कि आपात स्थिति में जनहित का प्रश्न है। जब आपात स्थिति हो, तो कारखाना अधिनियम को स्थगित कर दिए जाने का भी प्रावधान है। यह समझा गया कि कपड़े का अभाव आपात स्थिति नहीं कही जा सकती, और परिणामस्वरूप प्रांतीय सरकारें मौजूदा कानून में विद्यमान धाराओं के पालन की स्थिति में नहीं होती। इसलिए भारत सरकार ने विधेयक में एहतियात के तौर पर एक खंड जोड़ दिया है जो एक अन्य स्थिति के लिए प्रावधान है जो जनहित कहलाती है। मुझे आशा है कि यह खंड कपड़ा निर्माण के बारे में कपड़ा मिल मालिकों की विधेयक के प्रभाव के बारे में आशंकाएं दूर कर देगा।
श्रीमन्, अन्य खंड अर्थात खंड 3, 4 और 6 शुद्ध रूप से आनुषंगिक है। खंड 3, साल भर चलने वाली फैक्ट्रियों में दैनिक अधिकतम सीमा को 11 से 9 और मौसमी फैक्ट्रियों में 11 से 10 करता है। यह साल भर चलने वाली और मौसमी फैक्ट्रियों में नई अधिकतम सीमा नियत करने के प्रमुख परिवर्तन के अनुरूप है। खंड 4 और 6 समय सीमा को 13 घंटे से 12 घंटे करने में संबद्ध हैं और मुझे इसका स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं है। विधेयक के दूसरे प्रमुख प्रावधान के बारे में जिसके विषय में मैंने कहा है कि यह समायोपरि भुगतान की दर से संबंधित है, माननीय सदस्य देखेंगे कि समयोपरि भुगतान पर मौजूदा कानून में कोई समान व्यवस्था नहीं है। दरअसल दो भिन्न नियम हैंः एक साल भर चलने वाली फैक्ट्रियों के बारे में है और दूसरा मौसमी फैक्ट्रियोंं के बारे में। यदि 60 घंटे से अधिक काम लिया गया है तो 1 ½ गुने का भुगतान होगा। असल में दो भिन्न-भिन्न दरें हैं, एक है साल भर चलने वाली फैक्ट्रियों के लिए और दूसरी है मौसमी फैक्ट्रियों के लिए। मौसमी फैक्ट्री के लिए यदि काम के घंटे 60 से अधिक हैं तो 1 ½ गुना भुगतान होता है। यदि 54 से 60 घंटों के बीच है तो भुगतान 1 ¼ गुना है और यदि 60 से ऊपर है तो 1 ½ गुना। सरकार समझती है कि समयोपरि भुगतान की दरों में भेदभाव और अंतर न्यायोचित नहीं है इसलिए यह वांछनीय है कि समयोपरि भुगतान का एक ही नियम रहना चाहिए, चाहे फैक्टी किसी श्रेणी की हो। इसलिए विधेयक का उद्देश्य यह संशोधन करना है कि दरें डेढ़ गुना होनी चाहिए। मुझे आशा है कि सदन को अहसास होगा कि यह एक साधारण सा कदम है जो पहले ही उठा लिया जाना चाहिए था और सदन देर से उठाए गए इस कदम का समर्थन करेगा कि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में स्थापित मानक के अनुसार ही भारतीय कानून को बनाया जाए।