कारखाना (संशोधन) विधेयक
कारखाना (संशोधन) विधेयक
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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः श्रीमन्, मैंने एक संशोधन पेश करने वाले प्रस्तावक का भाषण सुना और यदि उस संशोधन के पक्ष में मात्र वही भाषण होता तो मैं उसका विरोध करता क्योंकि अब तक जो मैं सुन सका हूं माननीय प्रस्तावक ने अपना संशोधन पेश करते हुए कहा कि उन्होंने संशोधन इसलिए पेश किया है कि मैंने अपने भाषण में यह व्याख्या नहीं की है कि क्या भारत सरकार ने विधेयक पेश करने से पूर्व इस बारे में विभिन्न दलों से सलाह-मशविरा किया था। निश्चित रूप से मैं यह नहीं कह पाया, परंतु मैं समझता हूं कि इस संदर्भ में माननीय सदस्य इस बात से अवगत हैं कि पिछले कई वर्षों से एक संस्था श्रम सम्मेलन नाम से विद्यमान है जिसकी वार्षिक बैठक होती है। उसकी एक स्थायी समिति है जिसकी बैठक हर तिमाही में होती है। इसमें श्रमिकों, मालिकों और प्रांतीय सरकारों के प्रतिनिधि हैं। भारत सरकार यथासंभव सम्मेलन के समक्ष श्रम संबंधी प्रस्तावित कानूनों का मसौदा रखती है ताकि उन पर विभिन्न पक्षों का मत जाना जा सके। श्रीमन्, इस विधेयक के बारे में भी ऐसा ही किया गया था। मेरे पास खास तौर से तो यह सूचना नहीं है कि स्थाई श्रम समिति के विचार के लिए यह कितनी बार रखा गया परंतु मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि इस विधेयक पर उन दोनों में से एक समिति में (मैं भूल गया किस में) बहुत बारीगी से विचार किया जा चुका है। हमें पता चला कि सूती मिल मालिकों की कुछ कठिनाइयां हैं और कुछ आपत्तियां हैं और उसी दृष्टिकोण से एक खास संशोधन रखा गया है। मैं नहीं समझता कि इस संशोधन के प्रस्तावक ने कोई ठोस बात कही है। जैसा कि मैंने कहा, यदि वही एकमात्र आधार होता तो मैं विरोध करता परंतु बहस ने एक अजीब मोड़ ले लिया है।
प्रो. एन. जी. रंगा (गुंटूर और नेल्लोराः गैर-मुस्लिम ग्रामीण) एक स्वागत योग्य मोड़।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः शायद यह स्वागत योग्य मोड़ है। मैंने भाषणों में देखा, जो सदन के विभिन्न पक्षों से दिए गए हैं, कि श्रमिकों के प्रति प्यार जताने की होड़ लगी है। एक पक्ष एक बात कहता है। फिर दूसरा उठता है, जैसे वह ऊंची बोली लगा रहा हो, फिर तीसरा उससे भी बढ़कर।
एक माननीय सदस्यः आप और भी ऊंची बोली लगा सकते हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः इस पूरी बहस के दौरान मुझे एक अप्रसन्नता है। इस सदन में कुछ ऐसे सदस्य हैं जो रॉयल श्रम आयोग के सदस्य थे और जिन्हें
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 1, संख्या 7, 21 फरवरी, 1946, पृष्ठ 1312-13