304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चाहिए था कि वे व्यक्तिगत रुचि लेकर इन व्यवस्थाओं को पास कराते जिनकी उन्होंने आयोग के सदस्य के नाते सिफरिश की थी, सरकारी पक्ष से भी नहीं तो कम से कम गैर-सरकारी पक्ष से ही सही। परंतु वे ही कहते हैं कि मैं अनुदारवादियों से भी अनुदार हूं। मुझे यह दोषारोपण स्वीकार नहीं, परंतु मैं अनुभव करता हूं कि यह आवश्यक है कि विधेयक प्रवर समिति को सौंपा जाए जिससे कि जो-जो बयान दिए गए हैं, जो-जो दावे किए गए हैं, वे सामने आएं और जो दृष्टिकोण उन्होंने व्यक्त किए हैं, वास्तविक मत विभाजन में उनकी परीक्षा हो जाए और यह पता चले कि जो भावनाएं उन्होंने व्यक्त की हैं वे भावनाएं ही हैं या उनकी वास्तविक धारणाएं हैं। यदि ऐसा मैंने न किया होता, तो यह विपक्ष को छूट है कि वह कहता कि मैं अनुदारवादी हूं और विधेयक को कुछ सीमाओं से आगे नहीं बढ़ने देना चाहता और इसी कारण प्रस्ताव से मुंह मोड़ रहा हूं।
(इस समय माननीय सदस्यगण उठकर खड़े हो गए)
ऽश्री आर. वेंकटसुब्बा रेड्डियारः प्रवर समिति में नामों के बारे में मैंने पहले ही निवेदन कर दिया है। मैं दो नाम और जोड़ना चाहता हूं - श्री डी.ए. रामलिंगन चेट्टियार और रायबहादुर भट्टाचार्य।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं उन्हें स्वीकार करता हूं।
उपाध्यक्ष महोदयः प्रश्न हैः
‘‘कि यह विधेयक एक प्रवर समिति को सौंपा जाए जिसमें माननीय सर अशोक राव, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, प्रोफेसर एन.जी. रंगा, श्री वी. एन. गाडगिल, श्री वाडीलाल लालू भाई, दीवान चमनलाल, पंडित बाल कृष्ण शर्मा, श्री मोहम्मद नौमान, श्री मोहम्मद एम किलेदार, श्री हसन अहरावर्दी, श्री एस.सी. जोशी, श्री एस.सी. इसंकिप, कु. मणिबेन कारा, श्री एस. गुरुस्वामी, चौधरी श्री चंद, श्री टी. ए. रामलिंगम चेट्टियार, राय बहादुर डी.एम. भट्टाचार्य और प्रस्तावक शामिल हों और समिति को निर्देश दिया जाए कि वह 7 मार्च, 1946 या उससे पूर्व अपनी रिपोर्ट दे दें और बैठक में कम से कम पांच सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 1, संख्या 7, 21 फरवरी, 1946, पृष्ठ 1318