श्रम संबंधी कानून में एकरूपता
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6 सीटें गैर-यूरोपीय राज्यों के लिए आरक्षित है और खंड (4) के अनुसार नियोजकों के कोटे से दो सीटें गैर-यूरोपीय राज्यों को आवंटित की गई हैं। इस सिद्धांत को अपनाते हुए हमने नियोजकों और कर्मचारियों में से प्रत्येक के कोटे से एक प्रतिनिधि का केंद्रीय सरकार के श्रम प्रतिनिधि द्वारा नामनिर्दिष्ट करने का प्रस्ताव रखा है। इससे कुछ वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगा जिनका प्रतिनिधित्व मुख्य नियंत्रक और कर्मचारी संगठन नहीं करते। इन प्रस्तावों में न्याय और निष्पक्षता है जो आप पसंद करेंगे और आपको इनका अनुमोदन करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।
हम इन निकायों की स्थापना केंद्र में कर रहे हैं, पर जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं, श्रम का संबंध केंद्र की अपेक्षा प्रांतीय सरकारों से अधिक है और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उच्चतर स्तर पर गठित निकाय के लिए भी निचले स्तर से समर्थन की आवश्यकता होगी और इसलिए यदि प्रांतीय सरकारें भी इसी प्रकार के निकाय अपने प्रांतों में स्थापित करना चाहती हैं और ऐसे प्रश्नों का निबटारा करना चाहती है। जिनका केंद्रीय सरकार के संगठन निपटारा करते हैं तो मैं केंद्रीय सरकार की ओर से आश्वासन देना चाहता हूं कि हम निस्संदेह ऐसे किसी सुझाव को प्रोत्साहित करेंगे।
खुले श्रम सम्मेलन एवं स्थायी समिति की स्थापना
खुले श्रम सम्मेलन एवं स्थायी समिति के गठन की बाबत एक प्रस्ताव त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित किया गया था।
सम्मेलन में केंद्र और प्रांत सरकारों के राज्यों और सभी महत्वपूर्ण कामगार संगठनों के लगभग 50 प्रतिनिधि उपस्थित हुए और माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इसका उद्घाटन किया।
नियोजकों और कामगारों के प्रतिनिधि सम्मेलन के उद्देश्यों से पूर्णतः सहमत थे।
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष श्री वी. वी. गिरि ने सम्मेलन के गठन का स्वागत किया और यह आशा व्यक्त की कि वह केवल विचार-विमर्श में ही व्यस्त न रहकर श्रमिकों की स्थिति में सुधार और उद्योग के क्षेत्र में शांति के लिए काम करेगा।
भारतीय श्रम संगठन के अध्यक्ष श्री जमनादास मेहता ने कहा कि सम्मेलन के जरिए शांति सुनिश्चित होनी चाहिए और उद्योगों में इस संकट की घड़ी में स्थिरता आनी चाहिए।