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ऽभारतीय वित्त विधेयक
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः (श्रम सदस्य)ः अध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं आपका धन्यवाद करना चाहता हूं कि आपने मुझे वित्त विधेयक पर बहस के बीच में बोलने का अवसर दिय। मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि जिस मुद्दे पर मुझे बोलना है वह श्रम विभाग से संबद्ध नहीं है, जिसका मैं प्रभारी हूं। दरअसल अब तक वित्त विधेयक पर जो बहस हुई मुझे प्रसन्नता है कि उस विभाग के बारे में कोई गंभीर टिप्पणियां नहीं गई हैं। परंतु मैं इसलिए खड़ा हुआ हूं क्योंकि मैं समझता हूं कि मेरे माननीय मित्र पंडित गोविंद मालवीय ने कहा वित्त विधेयक पर अपने भाषण में कुछ विचार प्रकट किए हैं तो मैं समझता हूं अनुसूचित जातियों के एक कालेज की परियोजना पर हैं। श्रीमन्, मैं आमतौर से यह मामला शिक्षा विभाग के प्रतिनिधि के लिए छोड़ देता क्योंकि परियोजना का परीक्षण उन्होंने किया है और वित्त विभाग ने उसे स्वीकार कर लिया है। मेरी भूमिका इतनी है कि मैंने उसकी शुरूआत की थी। परंतु मैंने सोचा कि इस परियोजना का औचित्य ठहराना शिक्षा विभाग पर ही न छोड़ दूं क्योंकि इस परियोजना को मेरे माननीय मित्र राजनीतिक रूप देना चाहते हैं। इसी कारण मैं आज उनकी टिप्पणियों का जबाव देने के लिए खड़ा हुआ हूं।
मेरे माननीय मित्र ने यह कहकर शुरूआत की कि वह इस परियोजना पर आश्चर्यचकित हैं और जब मैंने उनका भाषण पढ़ा तो मैंने पाया कि उन्हें जो आश्चर्य अनुभव हुआ वह उनकी इस धारणा के कारण है कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में वर्गभेद की भावना भरेगी। मान्यवर, एक कहावत है कि सुविदित मुहावरा है, कि जो व्यक्ति स्वयं शीशे के घर पर रहता है वह दूसरों पर पत्थर न फेंके। मुझे आश्चर्य है कि मेरे माननीय मित्र पंडित मालवीय इस तथ्य को जानते भी हैं। मुझे बड़ा कौतुक लगा - मैं चकित हूं - कि मालवीय मुझे और सदन के किसी सदस्य को राष्ट्रीयता का उपदेश देने के लिए खड़े हो जाएं। किसी के लिए यह अजूबा है भी नहीं क्योंकि यह तो उनकी आदत
ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 4, संख्या 7, 26 मार्च, 1946, पृष्ठ 2926-31