भारतीय वित्त विधेयक
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का प्रसंग देता हूं, किसी पिछले वर्ष का नहीं बल्कि इसी महीने की 12 तारीख का। उन्हें पता चलेगा कि सेलम के ब्राह्मणों की बैठक में यह संकल्प लिया गया कि एक ब्राह्मण संघ बनाया जाए जिसका उद्देश्य ब्राह्मणों के हितों की रक्षा करना हो और ब्राह्मणों के लिए उद्योग चलाने के उद्देश्य से ब्राह्मणों के लिए एक कालेज
खोला जाए। और सम्मेलन का अध्यक्ष कौन था? महापुरुष साचिवोत्म सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर।
श्री अनंतशयनम आयंगरः आपका पुराना साथी।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मुझे पता नहीं। जब देश में सभी राष्ट्रवाद की बाते करें और वर्गवाद पर अमल करें .............
श्री अनंतशयनम आयंगरः मुझे दोनों पर अफसोस है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः ..................अनुसूचित जातियों में अपने जीवन में पहली बार अपने दुखों की चेतना आई है और वे ऐसी शिक्षा संस्था स्थापित करना चाहते हैं जिसमें उच्च शिक्षा पा सकें - इसके लिए सदस्य यहां आकर यह कहें कि वे एक वर्गवादी कार्य कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि में यह बुद्धिहीनता है। मैं इस सदन को बताना चाहूंगा कि यह कहना पूरी तरह मिथ्या बात है कि यह अनुसूचित जातियों का कालेज है। यह ऐसा कालेज है जो अन्य कालेजों की तरह सबके लिए
खुला रहेगा। इसमें किसी पर पाबंदी नहीं है।
पंडित गोविंद मालवीय (इलाहाबाद और झांसी डिवीजनः गैर-मुस्लिम ग्रामीण)ः बजट में क्या कहा गया है?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः पूरे महीने बजट आपके पास था और इसका विरोध करने से पहले आपको अल्पकालिक प्रश्न द्वारा ब्यौरा पूछना चाहिए था। अब, जैसा मैंने कहा, यह संस्था सबके लिए खुली है। यह कालेज न केवल सबके लिए खुला है, बल्कि इसका स्टाफ भी सभी वर्गों से लिया गया है। इसमें हिंदू हैं, ब्राह्मण हैं, गैर-ब्राह्मण है, पारसी हैं, ईसाई हैं, मुसलमान हैं और मैं सदन को बताना चाहूंगा कि जब इसे बंबई विश्वविद्यालय से संबद्ध करने का आवेदन किया गया तो उन्हें संबद्ध करने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ। वास्तव में यह माना गया कि बंबई विश्वविद्यालय के सामने कभी ऐसी परियोजना पेश ही नहीं की गई। और मैं कहता हूं कि बंबई विश्वविद्यालय के पूरे इतिहास में यह पहला उदाहरण है जहां किसी कालेज को आरंभ में ही पूरा कालेज मान लिया गया। इसका कारण हैं कि इसका संगठन, स्टाफ और प्रबंधन इतना उत्तम है। किसी भी दृष्टि से, यह अनुसूचित जातियों का कालेज नहीं हैं। इस कालेज में केवल यह अंतर रहेगा कि जहां तक