328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मेरे माननीय मित्र ने अपने भाषण के दौरान उठाया कि हिंदू समाज अनुसूचित जातियों के कल्याण और उसके नैतिक तथा भौतिक उत्थान के लिए बहुत कुछ कर रहा है। मैं मात्र इतना कहना चाहूंगा कि यदि कोई इस सदन के वातावरण से ही जानना चाहे कि क्या हो रहा है तो किसी ईमानदार व्यक्ति को बड़ी कठिनाई होगी कि वह इसके समर्थन में कुछ कह सके जो मेरे माननीय मित्र ने कहा है।
यह सत्य है कि मैं इस सदन का सदस्य बहुत कम समय से हूं, किन्तु मैं इस सदन की कार्यवाही बिल्कुल नियमित रूप से पढ़ता आ रहा हूं और इस सदन के विषय में ऐसा कुछ नहीं है जो मैंने न पढ़ा हो और पढ़ने योग्य हो। और श्रीमन्, पहले के बारे में मैं सोचता हूं यह कहना ठीक है कि बिरला ही कोई अवसर है जब यहां बैठे विपक्ष के किसी सदस्य ने सरकार से पूछा हो अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचार और दमन के बारे में जो सभी गांवों में रोजाना होते है। मुझे कार्यवाही में ऐसा कुछ नहीं मिला। मैंने किसी सदस्य को प्रस्ताव रखते नहीं देखा............
श्री अनंत शयनम आयंगरः आप कहेंगे यह तो प्रांतीय प्रश्न है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः ...............कि अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए कुछ किया जाए। एक अवसर था, जो मुझे याद है, जिस समय विपक्ष में बैठे सदस्यों ने अस्पृश्यता के विरुद्ध साहसपूर्ण प्रयत्न किया था। शायद वह 1932 या 34 में था, मैं सही समय भूल गया ..........
एक माननीय सदस्यः 1933
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः ................जब मंदिर प्रवेश का विधेयक लाया गया तो कितना हौहल्ला मचा जब वाइसराय ने उसकी अनुमति नहीं दी। लोगों ने भूख हड़ताल की और धमकी दी कि यदि विधेयक रखने की अनुमति नहीं दी गई तो वे आत्महत्या कर लेंगे। और जब इजाजत मिल गई तो क्या हुआ? हुआ यह कि इन सज्जनों ने विधेयक रद्दी में फेक दिया। उन्होंने इससे नाता तोड़ लिया। उन्होंने श्री रंगा अय्यर को मझधार में छोड़ दिय। उन्होंने इन्हें इस धोखे के लिए जमकर गालियां दीं। केवल दो मौकों पर ............
एक माननीय सदस्यः आपने कार्यवाई नहीं पढ़ी है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः इस सदन में जो हुआ वह सब मैंने पढ़ा है। मुझे केवल दो घटनाएं मिली हैं जब इस सदन में अनुसूचित जातियों के प्रश्न पर बहस चली। एक 1916 में जब श्री मानेकजी दादाभाई ने, जो अब दूसरे सदन के