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भारतीय वित्त विधेयक

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सभापति हैं, एक संकल्प पेश किया कि सरकार अनुसूचित जातियों की शिकायतों की जांच के लिए एक समिति का गठन करें और विपक्ष में बैठे मेरे उन्हीं मित्र के पिता ने जिन्होंने यह बहस शुरू की है उस कार्यवाही के दौरान हंगामा किया था। उन्हें पता चलेगा कि उनके पिता उस संकल्प के घोर विरोधी थे। दूसरा मौका 1927 में आया जब लार्ड बिकेनहैड ने अनुसूचित जातियों को अल्पसंख्यक बनाकर उन्हें संवैधानिक संरक्षण दिए जाने की बात कही थी। विपक्ष के मेरे मित्रों को उस समय मेरा बड़ा ध्यान आता है जब मैं अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कोई राजनीतिक मुद्दा उठाता हूं। यदि मैं पृथक मतदान की बात करता हूं, सेवाओं में आरक्षण मांगता हूं, यदि मैं शैक्षणिक अनुदान मांगता हूं, तब इन्हें पता चलता है कि मेरा अस्तित्व है। अन्यथा इनके लिए मैं मुर्दा हूं ..............

एक माननीय सदस्यः कुछ नहीं।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः ..............और मुझे कोई सामाजिक या आर्थिक अधिकार प्राप्त नहीं है क्योंकि वे कहते हैं कि मैं हिंदू हूं। यदि भाईचारा है भी तो मैं कहता हूं कि मैं उनका चेचरा भाई हूं, सगा भाई नहीं।

जो दूसरी बात मैं कहना चाहूंगा वह बहुत रचनात्मक है। मैं अपने हिंदू मित्रों से कहता हूं कि मैं उनकी कृपा पर जीना नहीं चाहता। मुझे उनकी दया की जरूरत नहीं। मैं इस देश का नागरिक हूं। मैं सरकार से उतना धन और लाभ लेने का अधिकारी हूं जितना दूसरे अपने लिए दावा करते हैं। मैं कृपा नहीं चाहता, कृपा वह चीज है जो मुझे और मेरे समाज को दास बनाती है और विश्वास घटाती है। अनुसूचित जाति के लोग अपना अधिकार चाहते हैं और इस अवसर पर मैं सदन को बता देना चाहता हूं कि यदि उनके दावों का विरोध किया गया तो अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए अपना खून बहाने से भी पीछे नहीं हटेंगे।