334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संबंधित उपबंधों को प्रभावित करने वाले कारखाना अधिनियम के संबंध में संशोधन करते हैं। तो हमें इस बात से सचेत होना चाहिए कि कपड़े के मामले में स्थिति और भी गंभीर न हो जाए। मेरे मित्र की आलोचना के उत्तर में मुझे कहना है कि हमने कपड़े के भीषण अभाव के बारे में ही विचार नहीं किया है, परंतु हमने इस स्थिति पर भी विचार किया है जो उपभोग की अन्य वस्तुओं के अभाव के बारे में उत्पन्न हो सकती है। भारत सरकार ने ऐसा संशोधन ही प्रस्तुत नहीं किया है जो केवल कपास उद्योग को ही राहत प्रदान करेगा, अपितु इस संशोधन को ऐसे व्यापक शब्दों में बनाया गया है कि जिससे उन अन्य उद्योगों को भी राहत मिलेगी जिनमें उपभोक्ता के लिए अन्य वस्तुएं तैयार की जाती हैं।
मैं बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूं कि वह ऐसे सामान्य उपबंध से सहमत क्यों नहीं है जो केवल उन्हें ही राहत नहीं देता अपितु अन्य कई उद्योगों को भी राहत देता है। मैं उनकी आलोचना की विशिष्टता को समझने में अभी भी असमर्थ हूं।
उन्होंने दो बातें कहीं हैं जिनके बारे में वह इस बात के अधिकारी हैं कि मुझे उत्तर देना ही है। उन्होंने एक तर्क दिया, वह इस प्रकार है - मेरे सामने उनके भाषण की प्रति भी है - कि यह छूट भारत सरकार द्वारा स्वयं इसी अधिनियम में दी जानी चाहिए थी और इसे प्रांतीय सरकार के विवेकात्मक प्राधिकार पर नहीं छोड़ना चाहिए था। इस आलोचना के लिए मेरा दो प्रकार का उत्तर हैः प्रथम, जैसा कि मेरे माननीय सदस्य को ज्ञात है, कानून के अंतर्गत छूट दिए जाने का अर्थ उस संविधान के अंतर्गत कार्यकारी प्राधिकार का प्रयोग करना हैं जो अब लागू किया जा रहा है, यद्यपि श्रम को समवर्ती सूची में रखा गया है जिससे भारत सरकार को केवल कानून बनाने का प्राधिकार ही मिलता है। इससे भारत सरकार को यह प्राधिकार नहीं मिलता कि उस कानून को कार्यान्वित किया जाए। समस्त कार्यान्वयन का कार्य प्रांतीय सरकार के हाथ में होना चाहिए और यदि हमने इस अधिनियम में सीधे छूट नहीं दी तो इसका कारण यह है कि यह केंद्रीय विधानमंडल की शक्ति से परे है कि ऐसा किया जाए। उन्होंने दूसरी कठिनाई का जो उल्लेख किया है, वह यह हैः भारत सरकार के लिए यह संभव कार्य नहीं है कि सूती वस्त्र उद्योग जैसे किसी विशेष उद्योग को रियायत देने के लिए अन्य उद्योगों की सूची से अलग से अधिनियम में वर्णित किया जाए। यह श्रम विभाग में किसी अन्य व्यक्ति के लिए असंभव है कि अन्य उद्योगों की आवश्यकताओं का पूर्वानुमान किया जाए और इस दिशा में विशेष उपबंध बनाए जाएं। उन्होंने यह आशंका व्यक्त की कि प्रांतीय सरकारें ऐसी छूट प्रदान नहीं करेंगी जिन्हें अधिक तत्परता से प्राधिकृत किया गया है और यदि मैं उन्हें सही तरीके से समझ सका हूं तो उन्होंने कहा कि प्रांतों में श्रमिक ऐसी छूट देने के मामले