अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक
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जाता है। उनकी दीवारें झाडि़यों की लकडि़यों अथवा कच्ची ईंटों की बनी होती हैं और उनकी छतें लकड़ी की शहतीरों की बनी होती है। वे बंद कमरों के घर होते हैं और उनमें दरवाजे होते हैं परंतु उनमें बहुत कम रोशनदान होते हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि ये क्वार्टर साधारण मजदूरों के लिए नहीं होते अपितु उन्हें उच्च कुशल कर्मचारियों के लिए आरक्षित किया जाता है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि इन क्वार्टरों मं रहने वालों के लिए मूत्रालय अथवा शौचालय की व्यवस्था नहीं है अतः वे लोग मलमूत्र त्यागने के लिए बाहर खुले मैदान में जाते हैं। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, इसके कारण संधि स्थैर्य और रक्तक्षीणता - जैसे रोग हो जाते हैं। मजदूर इन क्वार्टरों में रहना नहीं चाहते यद्यपि उनके नियोक्ताओं के प्रयास होते हैं कि वे उन क्वार्टरों में रहें। मजदूर 4 या 5 मील आते जाते हैं तथा इस प्रकार के प्रोत्साहन की अवहेलना करना अच्छा समझते हैं। इसके अलावा उनकी अपनी निर्मित झोपडि़यां नियोक्ताओं द्वारा उपलब्ध किए गए क्वार्टरों से अधिक अच्छी होती हैं।
मैं एक अन्य पैरा पढ़कर सुनाऊंगा जिसमें उन व्यावसायिक और अन्य प्रकार के रोगों का वर्णन है जो अभ्रक खानों में प्रचलित हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया हैः
‘‘अभ्रक के मजदूरों को जो रोग लग जाते हैं, उनका वर्गीकरण इस प्रकार हैः (क) ऐसे रोग जो प्रत्यक्ष रूप से खनन क्रियाओं और काम करने की दशाओं में फैल जाते हैं, और (ख) ऐसे रोग जो खनन क्षेत्र की परिस्थितियों तथा वहां प्राकृतिक वनस्पति उगने से हो जाते हैं। इस बारे में हमने बिहार से कुछ सूचना एकत्र की है और आगे दिया गया विश्लेषण इसी सूचना पर आधारित हैं।
(क) निम्नलिखित रोग प्रथम वर्ग के अंतर्गत आते हैंः-
(i) सिलिकोसिस (सिलिका धूलि के श्वसन से होने वाला रोग) यह फुप्फुसों का रोग है और यह स्फटिक चट्टान की सूखी मशीन ड्रिलिंग के कारण पैदा होता है। मशीन की ड्रिलों के अष्टकोणीय किनारे होते हैं जिनमें ड्रिल के मीटर तक सीधा छिद्र होता है। मशीन द्वारा ड्रिल घूमती है और इस ड्रिलिंग प्रक्रिया में जो स्फटिक कण पैदा होते हैं वे बड़ी ताकत के साथ छिद्र में से निकलकर बिखर जाते हैं और ड्रिलर से टकराते हैं। कुछ ही सैकिंड में स्फटिक धूल के मोटे बादल ड्रिलर को ढक लेते हैं और मजदूर की सांस से वह धूल लगातार उसके फुप्फुसों में जाती है। स्फटिक के लघु कण मजदूर के शरीर में प्रवेश करते हैं और उसके फुप्फुसों को हानि पहुंचाते हैं। सिलिकोसिस की पहली निशानी