342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ब्रानकॉइटिस है और यह रोग धीरे-धीरे बढ़कर सिलिकोसिस हो जाती है। इस
रोग का प्रभाव काफी होता है परंतु श्रमिकों के अधिक हो जाने के कारण वे इसे
प्रारंभ में नहीं जान पाते। इनमें से अधिकांश मजदूर शीघ्र मौत से इसलिए बच
पाते है कि वे मौसमी खेती का काम करने वहां से चले जाते हैं। यदि ड्रिलर
के आगे मजदूर बराबर पूरे वर्ष तक काम करता रहे तो वह इस रोग से बच
नहीं पाता और पांच वर्ष या इससे कुछ ही अधिक अवधि में काल-कवलित हो
जाता है। एक नियोक्ता ने यह बताया कि गत पांच वर्ष में उसके 16 सर्वोत्तम
ड्रिलर अपने प्राण खो बैठे। ऐसा लगता है कि इस रोग से ड्रिलरों को बचाने का
संभव उपाय यह है कि भारतीय खनन अधिनियम के अंतर्गत एक आदेश द्वारा
ड्राई मशीन ड्रिलिंग का निषेध किया जाए क्योंकि यह रोग लगभग सभी मामलों
में प्राणघातक सिद्ध हुआ है। क्रैसटीन माइनिंग कंपनी ने अपने आप अपनी कुछ
खानों में आर्द्र ड्रिलिंग का कार्य प्रारंभ किया है। परंतु किसी अन्य फर्म ने वर्तमान
युद्ध के दौरान किसी भी कीमत पर इसका अनुसरण करने के लिए योजना नहीं
बनाई। फिर भी इस बात पर यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि सभी नियोक्ताओं
ने अपने आप ही ड्राइड्रिलिंग के वैध निषेध के पक्ष में घोषणा की।’’
इसके बाद दुष्पचन, गठिया, काली खांसी और मलेरिया के होने का विवरण दिया गया है। मुझे उन तमाम रोगों की पूरी सूची में जाने की आवश्यकता नहीं है परंतु मैं इस रिपोर्ट के आगे दिए गए पैरे की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगाः-
‘‘कल्याणकारी कार्यकलाप अपनी नितांत अनुपस्थिति के कारण स्पष्ट हैं।
कैंटीन, क्रैच, मनोरंजन और धुलाई अथवा अन्य प्रकार की सुविधाएं अभ्रक खनन
क्षेत्र में बिल्कुल सुनने को नहीं मिलती। बड़ी-बड़ी फर्मों यथा क्रैंस्टीन माइनिंग
कम्पनी, छनुराम होरिलराम कंपनी और इंडिया माइका सप्लाई कंपनी ने चिकित्सीय
सहायता के प्रबंध किए हैं।’’
इसके बाद इनके विवरण आगे दिए जाते हैंः-
‘‘जहां कहीं भी चिकित्सीय सहायता उपलब्ध की जाती है, वह सहायता
निशुल्क होती है। फिर भी शिशु अथवा प्रौढ़ शिक्षा के लिए कोई भी प्रबंध नहीं
किए गए हैं।’’
श्रीमन्, इस रिपोर्ट के अंशों को उद्धत करने में काफी समय लग जाएगा, परंतु मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि अभ्रक खानों में कार्य करने की परिस्थितियां वस्तुतः