63. अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक - Page 368

अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक

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असहनीय हो गई हैं और अब समय आ गया है कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे तथा अभ्रक की खानों में कामगारों के लिए कुछ न कुछ करें।

श्रीमन्, अब प्रश्न यह है कि इस विषय से निपटने के लिए सबसे अच्छा उपाय क्या है। मुझे यह लगता है कि इस विषय के प्रतिपादन के लिए वस्तुतः दो तरीके हैं। पहला यह है कि यह दायित्व नियोक्ता पर डाल दिया जाए और कल्याण के कुछ उपाय निर्धारित कर दिए जाएं तथा नियोक्ता पर ही यह दायित्व डाला जाए कि यह उन उपायों को कार्यान्वित करे तथा सरकार के लिए यह शक्ति आरक्षित की जाए कि वह इस कार्य का निरीक्षण करे और यह देखे कि नियोक्ता पर जो दायित्व डाला गया है क्या वह उसको कार्यान्वित कर रहा है। दूसरा उपाय यह है कि सरकार को ही कल्याण संबंधी उपाय की प्रभारी होना चाहिए तथा इस संबंध में नियोक्ता को व्यय भार उठाना चाहिए। मेरे विचार से पहला उपाय अधूरा उपाय है और इसके दो कारण हैं। सर्वप्रथम अलग-अलग नियोक्ताओं की अलग-अलग क्षमताएं होती हैं और वे भिन्न-भिन्न तरीके से कल्याण संबंधी उपायों के व्यय भार उठा पाते हैं। बात यह है कि छोटे नियोक्ताओं के लिए यह संभव नहीं है उस स्तर को बनाए रखा जाए जैसाकि इस अधिनियम में निर्धारित किया गया है। दूसरे, सरकार के लिए कठिनाई से ही यह संभव है कि निरीक्षकों की अधिक संख्या में भर्ती की जाए ताकि वे बराबर आते-जाते रहें, निगरानी करते रहें और यह देखते रहें कि कल्याण संबंधी स्तर बनाए रखे जा रहे हैं। अतः सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि इस प्रकार के मामलों में सरकार के लिए यह अच्छा होगा कि वह अपने आप ही इस दायित्व का वहन करें और नियोक्ताओं पर इस बात को जोर दे कि वे इन कल्याणकारी उपायों के व्यय भार को उठाएं। श्रीमन्, यहीं सिद्धांत है जो अभ्रक उद्योगों में कार्यरत मजदूरों के कल्याण से संबंधित विधेयक में निहित हैं। मुझे यह कहने की अनुमति दी जाए कि जहां तक सरकार का संबंध है यह कोई ऐसा नया सिद्धांत नहीं है जिसे उसने अभी स्वीकार किया है। सदन को यह ज्ञात है कि युद्ध के दौरान सरकार ने कोयला खदान में कार्यरत लोगों के कल्याण कार्यों के लिए एक अध्यादेश जारी किया था। यह कल्याण कार्य अध्यादेश द्वारा सम्पन्न हुआ। इस वर्तमान विधेयक में वे ही सिद्धांत दिए गए हैं जो इस अध्यादेश में सम्मिलित किए गए थे। इसलिए मेरे लिए यह अनावश्यक है कि मैं उस सिद्धांत की आवश्यकता अथवा वांछनीयता पर विस्तार से चर्चा करूं जिस पर यह विधेयक आधारित है।

श्रीमन्, एक दूसरा विचार बिंदु है जिसके बारे में मैं कुछ कहना चाहूंगा। जैसा कि माननीय सदस्य देखेंगे, इस विधेयक के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि दो