344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समितियों का गठन किया जाए जो इन प्राधिकारियों को परामर्श दें जिन्हें इस कोष को संभालना है - कि इस कोष से किस प्रकार व्यय किया जाए। एक सलाहकार समिति मद्रास प्रांत के लिए होगी और दूसरी समिति बिहार प्रांत के लिए होगी। कुछ सदस्य यह सोचेंगे कि भारत सरकार ने ऐसा कोई कारण क्यों नहीं बताया कि उदाहरणार्थ किसी अन्य अभ्रक उत्पादन क्षेत्र, जैसे राजपूताना, को अभ्रक उत्पादन क्षेत्र के रूप में विचार करने से क्यों छोड़ दिया है। मैं सदन को इस कारण की व्याख्या देना चाहूंगा कि हमने यह आवश्यक क्यों नहीं समझा कि राजपूताना के लिए भी तीसरी समिति गठित की जाए। इस समय अभ्रक उद्योग में राजपूताना का बहुत छोटा स्थान है और इस बारे में मैं सदन के सामने कुछ आंकड़े प्रस्तुत करना चाहूंगा। भारत की अभ्रक
खानों पर विचार किया जाए। मेरे पास 1941 के आंकड़े हैं। 1941 में बिहार में खानों की कुल संख्या 623 थी और इनमें से वर्ष पर्यन्त काम करने वाली खानों की कुल संख्या 297 थी। मद्रास में खानों की कुल संख्या 108 थी और वर्ष पर्यन्त काम करने वाली खानों की संख्या 47 थी जबकि राजपूताना में खानों की कुल संख्या 62 थी और उनमें से वर्ष भर काम करने वाली खानों की कुल संख्या केवल 8 थी। यदि इन खानों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या पर विचार किया जाए तो मेरे पास 1943 के आंकड़े हैं। ये आंकड़े इस प्रकार हैंः बिहार में अभ्रक खदानों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या 81,431 थी, मद्रास में यह संख्या 18,379 थी और राजपूताना में यह संख्या केवल 15,000 थी। इसलिए यह समझा गया कि राजपूताना के लिए अलग समिति का गठन न किया जाए।
इन सभी समितियों में बहुत अधिक प्रशासनिक व्यय होता है और मैं नहीं चाहता कि कोष को केवल प्रशासन के ऐसे मामलों पर व्यय किया जाए जिसमें हम सहायक हो सकते हैं। इसलिए वहां के लिए मेरा प्रस्ताव है कि एक समिति न बनाकर मितव्ययता बरती जाए और इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए कोई अलग उपाय किया जाए। श्रीमन्, जैसा सदन को ज्ञात है, यह मामला तात्कालिक आवश्यकता का है और मेरी उत्कृष्ट इच्छा है कि इस विधेयक को कानूनी पुस्तक में स्थान दिया जाए।
मुझे यह विदित हुआ कि माननीय सदस्यों के नाम पर एक संशोधन यह है कि इस विधेयक को प्रवर समिति को भेजा जाए। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। मैं इस विधेयक को प्रवर समिति को भिजवाने के पक्ष में नहीं हूं क्योंकि मैं समझता हूं कि यह विधेयक न तो इतना विवादग्रस्त है और न इतना जटिल कि इसे प्रवर समिति को अपना समय देने के लिए विचारार्थ भेजा जाए। फिर भी यदि इस सदन के सदस्य इस विधेयक को प्रवर समिति के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक हैं और वे इस