63. अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक - Page 371

346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दीवान चमन लालः क्या मद्रास और बिहार से प्राप्त धन को राजपूताना के मजदूरों की सहायता के लिए व्यय किया जाएगा?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः हम मजदूरों के कल्याण से संबंधित कार्यकलापों के लिए किसी अन्य एजेंसी अथवा संगठन को काम पर लगा सकते हैं। इसका भुगतान कोष द्वारा किया जाएगा।

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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं उस आलोचना का उत्तर देने में अधिक समय नहीं लगाना चाहता जो इस विधेयक के विरुद्ध की गई है। मैं इस संबंध में उन बातों पर सारांश में अपनी राय प्रकट करना चाहता हूं जो मेरे मत के बारे में तीन वक्ताओं ने उठाई हैं। सर्वप्रथम, मैं उन बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा जो मेरे मित्र श्री टाइसन ने उठाई हैं। मैंने अपने भाषण में ऐसा कोई संदर्भ नहीं दिया है जो मैंने अभ्रक के अतिरिक्त स्टॉक अथवा उन अन्य करों के बारे में हो, जिनके लगाए जाने का प्रस्ताव है और मैंने न्यायमूर्ति रियूबेन की रिपोर्ट के बारे में भी कुछ नहीं कहा है। श्रीमन्, मैंने जानबूझ कर अपने भाषण में इन बातों का उल्लेख नहीं किया है। क्योंकि मैं जानता था कि इन बातों को मेरे मित्र श्री टाइसन अपने भाषण में उठाएंगे और मुझे उनकी बातों का उत्तर देना होगा। यदि मैंने ऐसा नहीं किया तो मुख्यतया इसका कारण यह था कि मैं सदन का समय बचाना चाहता था।

श्रीमन्, अब स्थिति यह है कि यद्यपि श्रम विभाग और भारत सरकार ने अब यह निर्णय लिया है कि प्रोफेसर आदरकर की रिपोर्ट के आधार पर समाज कल्याण के अधिनियम पर विचार किया जाए, तथापि उनके कल्याणार्थ कदम उठाने का निर्णय आदरकर रिपोर्ट से बहुत पूर्व ही श्रम विभाग ने लिया था। मुझे यह बताने में प्रसन्नता है कि श्रम विभाग ने जो निर्णय लिया है, उसका न्यायमूर्ति श्री रियूबेन ने खनन उद्योग की अपनी रिपोर्ट में पूर्णतया समर्थन दिया है।

उन्होंने वस्तुतः यह सुझाव दिया है कि उत्पादित अथवा निर्यात की गई अभ्रक पर सामान्य रूप से उपकर लगाया जाना चाहिए और इस सामान्य उपकर की प्राप्तियों का लगभग 5/12वां भाग अभ्रक खानों में काम करने वाले मजदूरों के कल्याण के लिए अलग रख देना चाहिए। अतः इस अधिनियम के अनुसार कार्य करने में रियूबेन रिपोर्ट से कोई भिन्नता नहीं है। हमने जो किया है वह यह है कि श्री रियूबेन रिपोर्ट द्वारा अलग-अलग प्रयोजनों के लिए वितरित और आवंटित एकल उपकर के बजाय

ऽ विधान सभा वाद-विवाद (केंद्रीय), खंड 5, संख्या 7, 9 अप्रैल, 1946, पृष्ठ 3757-59