63. अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक - Page 373

348 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस बात की प्रसन्नता है कि कुल मिलाकर उद्योग ने कल्याण विधि के बारे में मेरे सुझाव को स्वीकार किया। यह मामला पुनः 9 नवम्बर, 1945 को उठाया गया जब कोयला खनन कल्याण आयुक्त की अध्यक्षता में धनबाद में सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में भी अभ्रक उत्पादकों में इस सुझाव को स्वीकार किया। अंत में 19 दिसम्बर, 1945 को धनबाद में तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता श्रम विभाग के सचिव ने की और इस सम्मेलन में सरकार तथा अभ्रक

खदान मालिकों के मध्य अंतिम समझौता सम्पन्न हुआ। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इस उद्योग पर उपकर लगाए जाने के हमारे प्रस्ताव ने अभ्रक उत्पादन के क्षेत्र को और अधिक बढ़ाने के संबंध में उद्योग को हतोत्साहित नहीं किया और मैं समझता हूं कि अंतिम कुछ महीनों के दौरान, जहां तक मुझे ज्ञात है, तीन बड़ी नई कंपनियां अभ्रक के क्षेत्र में प्रवेश कर रही है। उदाहरणस्वरूप, मैं यह बताना चाहूंगा कि 5 लाख रुपए की प्राधिकृत पूंजी की सहायता से मद्रास में माइकैंटिक एंड माइका प्रोडक्ट्स कंपनी लिमिटेड के नाम से एक नई कंपनी अस्तित्व में आई है। एक दूसरी कंपनी 5 लाख रुपए की प्राधिकृत पूंजी से कलकत्ता में सरस्वती माइका इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम से बनी है। मुझे इस तथ्य का भी पता है कि क्रिश्चियन माइलिंग इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने भी अभ्रक खनन और माइकेनाइट फैक्टरी की स्थापना के लिए पूंजी निर्गम के लिए आवेदन किया था। इन परिस्थितियों से यह विदित होगा कि उद्योगों ने इस उपकर को दुःखद नहीं समझा है और मेरा विचार है कि उन उद्योगपतियों को विश्वास है कि इस उद्योग के लिए यह संभव होगा कि यह कल्याण उपकर उद्योग का भार वहन कर सकेगा।

मेरे मित्र दीवान चमन लाल ने जो बातें उठाई हैं, उसके बारे में मैं क्षमाप्रार्थी हूं कि मैं उन्हें रिपोर्ट की वह प्रति नहीं दे सका जो वह प्रारंभ में चाहते थे। मैं यह कहना चाहूंगा कि मैं बिल्कुल ही भूल गया। परंतु मेरा विचार यह नहीं है कि उन्होंने उस मामले को ठीक उसी प्रकार उठाया है जैसा कि उन्हें चाहिए था। शायद वह कहते कि यदि उसके पास रिपोर्ट होती तो वे अपने इस भाषण की लंबाई इससे दुगनी कर देते।

उन्होंने एक प्रश्न किया है कि इस उपकर से कितना राजस्व प्राप्त होगा, मैं सदन को उसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं बता सकता और इसका कारण स्पष्ट है। अभ्रक का उत्पादन नियमित रूप से स्थिर नहीं हुआ है। उदाहरणार्थ मेरे पास 1934 से 1944 तक के आंकड़े हैं। 1934 में उत्पादित अभ्रक का मूल्य 6,30,525 रुपए था जबकि 1944 में उसका मूल्य 273,01,458 रुपए था और समय-समय पर अन्य