63. अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक - Page 374

अभ्रक खान श्रमिक कल्याण कोष विधेयक

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वर्षों में ये आंकड़े अलग-अलग रहे। अतः मेरे लिए यह नहीं होगा कि सदन को कोई विशेष आंकड़ा बताऊं। हमें युद्धोत्तर काल में कुछ समय इस उद्योग को स्थायित्व प्राप्त करने के लिए देना चाहिए। परंतु 1944 के आंकड़ों को देखते हुए मेरी यह गणना है कि यह उपकर लगभग 5 लाख रुपए तक होगा। मैं यह कहता हूं कि यह अधिक राशि नहीं है। व्यक्तिगत रूप से मैं एक सिद्धांत की स्थापना के लिए संघर्षरत हूं। यदि बाद में यह पाया जाए कि यह कोष पर्याप्त नहीं है तो सरकार के ऐसे किसी सदस्य के लिए यह खुला आमंत्रण होगा कि वह आगे आए और इस उपकर में वृद्धि करवाए। इस प्रकार राशि में वृद्धि होगी तथा इससे उन समाज कल्याण के कार्यों को सम्पन्न किया जा सकेगा जिन्हें अन्यथा सम्पन्न करना संभव नहीं होगा।

जहां तक अभ्रक खरीद मिशन की बात है जो मेरे मित्र ने उठाई है, उसका इस विधेयक से कोई संबंध नहीं है जिस पर हम विचार कर रहे हैं। अतः अभ्रक खरीद मिशन के कार्यकलापों से उभरने वाले प्रश्नों के संबंध में विचार करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। परंतु मैं अपने मित्र को बता सकता हूं कि जहां तक मुझको इसके बारे में ज्ञात है, इस देश में अभ्रक उत्पादन में कार्यरत उद्योगपतियों को इस बारे में कोई हानि नहीं उठानी पड़ी है, अपितु मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि उन्होंने सामान्य की अपेक्षा अधिक लाभ कमाया है।

मेरे मित्र दीवान चमन लाल ने खनन अधिनियम के प्रशासन की शिथिलता के बारे में काफी लंबा भाषण दिया है। उन्होंने बच्चों को काम पर लगाने तथा महिलाओं को काम पर लगाने से उत्पन्न अन्य मामलों के बारे में उल्लेख किया है। मैंने कहा, मैं इस तथ्य से काफी अवगत हूं और श्रम विभाग इस विधान के प्रारंभ करने से पूर्व उन तमाम दोषों को दूर करना चाहता है जो श्री आदरकर ने अपनी रिपोर्ट में अभ्रक खदानों के मजदूरों के संबंध में बताई है। यदि सरकार के पास समय होता, तो इस सत्र के दौरान यह संभव होता कि इस विधेयक में उन दोषों को दूर कर दिया जाए। परंतु इसमें मुझे संदेह नहीं है कि यह काम विलंब किए बिना ही सम्पन्न कर लिया जाएगा।

मेरे मित्र श्री राम नारायण सिंह ने कुछ बातें उठाई हैं। मैं समझता हूं कि उन्होंने एक बहुत बड़ी बात कही कि इस अधिनियम के पारित करने में बहुत विलंब हुआ है। उन्होंने बताया कि पहले से ही अभ्रक उद्योग विद्यमान था और इसके अपने दोष भी थे, सरकार भी थी परंतु इस संबंध में कुछ भी नहीं किया गया। यदि मुझे यह कहने की अनुमति दी जाए, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि वह एक बात का उल्लेख करना भूल ही गए कि वे भी इन कार्यों के साथ संलग्न थे और कई वर्ष से कार्यरत रहे हैं। यदि उन्होंने इस मामले को उठाने के शीघ्र अवसर का लाभ उठाया होता, सरकार और उद्योगपतियों के अंतःकरण को उत्प्रेरित और संगठित किया होता, तो इसमेंं मुझे कोई संदेह नहीं कि जिस विलंब की उन्होंने शिकायत की है वह कभी