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भारत की स्थिति
अध्यक्ष महोदय (माननीय सर अब्दुर रहीम)ः अब सभा निम्नलिखित प्रस्ताव पर चर्चा आरंभ करेगीः
‘‘भारत की स्थिति पर विचार किया जाए।’’
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ऽमाननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (श्रम-सदस्य)ः श्रीमन्, प्रस्ताव पर जो बहस पिछले दो या तीन दिनों से चल रही है उससे यह पता चलता है कि इस सभा के सदस्यों द्वारा रखे गए विचार दो प्रकार के हैं। एक विचार यह है कि कांग्रेस सदस्यों को सरकार द्वारा गिरफतार किया जाना और भड़के हुए उग्र आंदोलन को दबाना न्यायोचित नहीं था। सभा में एक अन्य वर्ग का मानना है कि सरकार द्वारा की गई कार्यवाही पूर्णतः न्यायोचित है। ऐसी स्थिति में सरकार का यह कहना ठीक होगा कि बहस में मात्र इस कारण से हस्तक्षेप करना अनावश्यक है कि सभा का एक पक्ष दूसरे पक्ष की बात को रद्द करता है। किन्तु हमारे माननीय साथी विधि मंत्री ने जो कुछ कहा उससे मुझे यह प्रतीत होता है कि सरकारी सदस्यों, खासकर कार्यकारी परिषद के भारतीय सदस्यों के लिए यह ठीक नहीं होगा कि इस मामले को वहीं का वहीं रहने दें। बजाय इसके कि यह जिम्मेदारी सभा के ही एक वर्ग पर छोड़ दी जाए, मैं समझता हूं कि यह बहुत आवश्यक है कि यह भार सरकारी सदस्य अपने ऊपर लें और इसलिए, मैं ऐसे कुछ मुद्दों का निपटान करना चाहता हूं जिन्हें सभा के उस वर्ग ने उठाया है, और जो समझता है कि कार्यवाही न्यायोचित नहीं थी।
मुद्दे जो उठाए गए हैं वे स्पष्ट रूप से दो वर्गों में आते हैं। कुछ मुद्दे अपनी प्रकृति और महत्व की दृष्टि से विशिष्ट हैं, कुछ मुद्दे सामान्य महत्व के हैं, और चाहे हम में से कुछ के लिए यह वांछनीय हो कि केवल विशिष्ट मुद्दों पर ही विचार न करें
ऽ विधान सभा वादविवाद (केन्द्रीय) खंड 3, दिनांक 18 सितम्बर, 1942, पृष्ठ 281-87