3. भारत की स्थिति - Page 39

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बल्कि सामान्य मुद्दों पर भी बात करें, मुझे भय है कि समय इतना कम है कि लगाए गए आरोपों में से कुछ का ही जबाव संभव होगा। इसलिए मैं सरकार के विरुद्ध विरोधी पार्टी द्वारा लगाए गए आरोपों में से दो पर ही टिप्पणी करूंगा।

महोदय, सरकार के आलोचकों ने कहा है कि कांग्रेसी सदस्यों को सरकार द्वारा गिफतार करना न्यायोचित नहीं था और यदि मैं तर्क को ठीक से समझता हूं तो तर्क से यही प्रतीत होता है कि कांग्रेस ऐसी संस्था है जो अंहिसा में विश्वास करती है और यदि कांग्रेस को स्वतंत्र रखा गया होता तो वह स्थिति को इस तरह नियंत्रण में कर लेती कि हिंसा होने ही न पाती। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जिन सदस्यों ने यह दलील दी है उन्होंने इस बात का ठीक से अध्ययन नहीं किया कि पिछले दो वर्षों से कांग्रेस और इसकी र्का समिति के सदस्यों को अहिंसा के सिद्धांत को लेकर क्या हो गया है। मान्यवर, मैं पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान कांग्रेस की कार्यवाहियों को पढ़ता रहा हूं। मेरे मन पर इसकी जो छाप पड़ी है उससे तो स्पष्ट है कि अहिंसा के सिद्धांत से जबरदस्त विलगाव हुआ है। अहिंसा को गहरा दफना दिया गया है। यह कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है।

अब मैं सभा को कुछ तथ्यों से अवगत कराना चाहता हूं। महोदय 22 दिसम्बर, 1939 को कांग्रेस ने सबसे पहले सिविल अवज्ञा आंदोलन की धमकी दी। फिर 19 मार्च, 1940 को कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन रामगढ़ में हुआ। इस वार्षिक अधिवेशन में गांधी जी को सर्वोच्च संचालक बनाया गया और संघर्ष का पूरा प्रभार उन्हें सौंपा गया। इस प्रस्ताव के जरिए गांधी जी सर्वोच्च सेना-नायक बन गए, किन्तु 22 जून, 1940 को मात्र तीन महीने के भीतर ही गांधी जी को सर्वोच्च सेना-नायक के पद से हटना पड़ा। कार्य समिति ने कार्यवाही के लिए अहिंसा को मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने से इन्कार कर दिया और श्री गांधी को त्यागपत्र देना पड़ा।

डॉ. पी.एन. बनर्जी (कलकत्ता-उपनगर गैर-मुस्लिम शहरी)ः यह बात युद्ध के संबंध में थी।

माननीय डॉ. आर. आर. अम्बेडकरः कृपया मुझे टोकें नहीं।

15 दिसम्बर, 1940 को अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक बंबई में हुई और वहां एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसके जरिए गांधी जी को एक बार फिर सर्वोच्च सेना-नायक बनाया गया और उनसे आग्रह किया गया कि वे संघर्ष का संचालन करें।