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भारत की स्थिति

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जा सकता है, फिर भी सरकार का यही कर्तव्य नहीं है कि वह दमन को दमन से रोक दे, बल्कि सरकार को रचनात्मक कदम उठाना चाहिए।

जब कोई उन रचनात्मक कदमों की जांच करना आरंभ करता है जिनका उल्लेख सदन के विभिन्न वर्गों ने किया है, तो आश्चर्य से आपकी आंखें फटी रह जाएंगी यह जानकर कि कितने अस्पष्ट सुझाव दिए गए हैं। इसलिए मैं इनमें से एक को लेता हूं जो कुछ ठोस है और जिसे आप स्वयं जांचना चाहेंगे। यह सुझाव दिया गया है कि वर्तमान सकरार का पुनर्गठन हो, इसे नया स्वरूप दिया जाए और यह राष्ट्रीय सरकार की तरह काम करे। मैं इस सदन में अपने विचार रख सकूं जो इस सुझाव की बाबत रखना चाहता हूं तो यही बेहतर होगा कि मैं यहीं से आरंभ करूं कि वर्तमान सरकार क्या है, इसकी प्रकृति क्या है। जैसा कि माननीय सदस्य अवगत हैं, भारत सरकार अधिनियम की धारा 33 में कहा गया है कि भारत सरकार का नागरिक एवं सैनिक अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत के गवर्नर जनरल-इन-कौंसिल में निहित है। मैं संवैधानिक वकील हूं। मैं यह दावा नहीं करता कि इस विषय का विशेषज्ञ हूं, पर यह दावा करता हूं कि इसका छात्र हूं और धारा 33 की परीक्षा करने और अन्य संविधानों से इसकी तुलना करने पर और इसे एक ऐसा प्रावधान मानकर कि भारतीय जनता इसी प्रकार की सरकार चाहती है, मुझे यह कहने में झिझक नहीं है कि धारा 33 में ऐसी सरकार का उपबंध किया गया है जिसकी दो विशेषताएं हैं जो निश्चित महत्व की हैं। एक विशेषता जो इस सरकार में है वह यह है कि इसमें निरंकुशता के लिए बिल्कुल स्थान नहीं है। दूसरी विशेषता इस सरकार में यह है कि इसमें सामूहिक उत्तरदायित्व अधिरोपित किया गया है, जो भारतीय जनता के मन में बसा हुआ तत्व है -

एक माननीय सदस्यः क्या इसका पालन हो रहा है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इस बात पर आऊंगा। अधिनियम में पर्याप्त उपबंध उपबंध किया गया है। सरकार गवर्नर जनरल में निहित नहीं है, किसी एक प्राधिकारी में निहित नहीं है, बल्कि यह गवर्नर जनरल-इन-कौंसिल में निहित है................

श्री जमनादास एम. मेहता (बंबई केंद्रीय मंडल,ः गैर मुस्लिम ग्रामीण)ः राज्य सचिव के आदेश के अधीन रहते हुए।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं इस मुद्दे पर आ रहा हूं। मैं इन सभी बातों पर विचार रखूंगा। स्थिति यह है कि कार्यकारी परिषद का प्रत्येक सदस्य गवर्नर जनरल का सहयोगी है। इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता। इसलिए, मेरा निवेदन