24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में काम कर रहा है अर्थात आविष्कार, भारी रसायन और प्राकृतिक नमक। उपयोगिता शाखा खनिजों की खोज और उनके उत्खनन का काम करती है। स्पष्ट है कि इनके कार्य अलग-अलग हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान बोर्ड और उपयोगिता शाखा में परस्पर संबंध भी है और यह संबंध बराबर चला आ रहा है। डॉ. फाक्स, जो भारतीय भू-सर्वेक्षण के प्रभारी हैं, भारी रसायन समिति के अध्यक्ष भी हैं जो वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान बोर्ड के अधीन है। दूसरी ओर वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान बोर्ड के निदेशक भारतीय भू-सर्वेक्षण की उपयोगिता शाखा के सदस्य भी हैं। दूसरी बात यह है कि इस व्यवस्था से सदन को पता चलेगा कि दोनों विभागों के बीच परस्पर विचार-विनिमय की व्यवस्था बनी है।
अन्य दो प्रश्न और हैं जिनका जिक्र हमारे सम्मानित साथी ने किया है। उन्होंने सरकारी कार्यवाही की आलोचना करते हुए कहा कि भारत की खनिज संपदा की उपेक्षा हो रही है और यह भी कहा कि उपयोगिता शाखा को बर्मा के विस्थापितों को और अधिक रोजगार प्रदान कराने के लिए स्थापित किया गया था। मान्यवर, प्रथम प्रश्न के बारे में, मुझे उतना ही खेद है जितना मेरे माननीय मित्र को कि खनिज संपदा का विकास पहले नहीं किया गया। किन्तु मैं समझता हूं कि मेरे माननीय मित्र महसूस करेंगे कि तीन प्रमुख कठिनाइयां थीं जिनके कारण भारत में ऐसी परियोजना पहले आरंभ नहीं की गई जैसी अब हमने हाथ में ली है, अर्थात उपयोगिता शाखा की स्थापना। यह स्वीकार करना होगा कि अब तक भारतीय भू-सर्वेक्षण के पास आवश्यक योग्यता वाले सरकारी खनन कार्य के कार्मिक नहीं थे। दुर्भाग्यवंश, भारतीय भू-सर्वेक्षण ने वही कार्य पद्धति अपनाई जो इंग्लैंड के भू-सर्वेक्षण विभाग की थी अर्थात खानों के निरीक्षक के रूप में कार्य करना न कि विशेषज्ञों के तकनीकी निकाय के रूप में जो भारत की खनिज संपदा के विकास में योगदान करती। दूसरे, खनिज विदोहन में यहां तनिक संकोच है जो खनिज भंडारों के खुल जाने से होने वाले जोखिम को लेकर है। भारत में एक सामान्य धारणा बन गई है जो संभवतः लंबे अरसे से खानों का उपयोग न करने के कारण बनी है कि भारत में अधिकांशतः ऐसी खनिज संपदा है जिनका निर्यात होता है जैसे मैगनीज और भ्रमक। मैं सदन और अपने माननीय मित्र को यह बताना चाहता हूं कि हमें खेद है कि हमने इस व्यवसाय को पहले क्यों नहीं बढ़ाया और अब इसे हाथ में लिया है। परंतु मैं यही कहूंगा कि यह देर आए, दुरुस्त आए वाली बात है।
जहां तक बर्मा के विस्थापितों के नियोजन का संबंध है, मैं अपने माननीय मित्र और सदन को बताना चाहता हूं कि इस मामले में वस्तुतः हमारे सामने कोई विकल्प नहीं था। जैसा कि मैंने अपने माननीय मित्र को बताया, हमारे पास खनन कार्य करने वाले सरकारी कर्मकारों की कमी थी। बर्मा ही एकमात्र ऐसा स्थान था जहां खनन