भारतीय श्रमिक युद्ध जीतने के लिए क्यों दृढ़-संकल्प हैं
नई नाजी व्यवस्था
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ये हैं श्रमिकों के आदर्श। इन्हीं से नई व्यवस्था का स्वरूप बनता है। इनकी स्थापना से ही मानवता विनाश से बच सकती है। यदि मित्र राष्ट्र युद्ध में हार जाते हैं तो यह नई व्यवस्था कैसे स्थापित होगी? यहीं वह सर्वोच्च प्रश्न है जिसे श्रमिक जानता और है और इसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती और इससे बचना भी घातक होगा। क्या हाथ पर हाथ रखकर बैठने से और लड़ने से इंकार करने से नई व्यवस्था स्थापित की जा सकती है? श्रमिक को विश्वास है कि मित्र राष्ट्रों की विजय से ही आशा की किरण नजर आ सकती है जिससे नई व्यवस्था का प्रादुर्भाव हो सकता है। यदि मित्र राष्ट्र विफल हो जाते हैं तो निश्चय ही नई व्यवस्था कायम होगी। किन्तु वह नई व्यवस्था नाजी व्यवस्था ही होगी। यह व्यवस्था ऐसी होगी जिसमें स्वतंत्रता दबा दी जाएगी, समानता नहीं मिलेगी और भाईचारे को घातक सिद्धांत मानकर समाप्त कर दिया जाएगा।
यह पूर्ण रूप से नई नाजी व्यवस्था नहीं है। नाजी व्यवस्था के कुछ लक्षण हैं जिसके बारे में प्रत्येक भारतीय को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए कि इससे क्या संकट उत्पन्न हो सकते हैं। इसके लिए धर्म, जाति, राजनीतिक आस्था का भेदभाव भूलकर विचार करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण अंग वह है जिसमें जातीयता के आधार पर वर्गभेद निरूपित किया गया है। नाजी व्यवस्था का यहीं मूल मंत्र है। नाजी लोग जर्मन जाति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। अन्य श्वेत जातियों को जर्मनी से नीचे स्थान देने में उन्हें आनंद प्राप्त होता है। किन्तु भूरी जातियों को - जिनमें भारतीय भी आते हैं - श्रेणी में सबसे नीचा स्थान मिला है। इतने अपमान से ही पेट नहीं भरा तब नाजियों ने घोषणा की कि भूरी जातियां जर्मनी और श्वेत लोगों की दास होंगी। इन्हें शिक्षा न दी जाए, इन्हें राजनैतिक या आर्थिक स्वतंत्रता न दी जाए।
प्रत्यक्ष खतरा
हिटलर ने अपनी पुस्तक ‘मैन कैम्फ‘ में जिन क्रोधयुक्त शब्दों में ब्रिटिश सरकार की भारतीयों को शिक्षा और राजनैतिक स्वाधीनता देने के लिए भर्त्सना की है उसे सभी जानते हैं। नाजी दर्शन भारतीयों की स्वाधीनता के लिए प्रत्यक्ष खतरा है। यह एक ऐसा कारण है जिसके लिए भारतीयों को इस युद्ध में नाजीवाद से लड़ने के लिए आगे आना चाहिए। यदि कोई नाजी व्यवस्था की तुलना उस नई व्यवस्था से करता है जो श्रमिकों के दिमाग में है तो उस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि श्रमिक