भारतीय श्रमिक युद्ध जीतने के लिए क्यों दृढ़-संकल्प हैं
फ्रांसीसी क्रांति की याद
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कुछ निराशावादी भी हैं जो कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि विजय के बाद नई व्यवस्था आएगी। इस निराशावादी के लिए कोई स्थान नहीं है। नई व्यवस्था, जो श्रमिक का आदर्श है, उसकी जड़ फ्रांसीसी क्रांति में है। फ्रांसीसी क्रांति ने दो सिद्धांतों को जन्म दिया - स्वशासी सरकार का सिद्धांत और आत्म निर्णय का सिद्धांत। स्वशासी सरकार के सिद्धांत में जनता की उस इच्छा की अभिव्यक्ति होती है कि वह स्वयं शासन करे न कि दूसरों द्वारा शासित हो, शासक चाहे पूर्ण स्वेच्छाचारी, तानाशाह हों या विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग हों। इसे प्रजातंत्र कहा जाता है।
आत्म-निर्णय का सिद्धांत समान आदर्श और समान प्रयोजन वाले लोगों की इच्छा व्यक्त करता है जिस पर बाह्य दबाव न हो। इसकी राजनैतिक हैसियत-चाहे स्वतंत्र हो, या परस्पर निर्भर या संसार के अन्य लोगों के संघ से मिलकर बने - इसे राष्ट्रीयता कहते हैं। इन सिद्धांतों के परिणाम पर मानवता की आशा केंद्रित थी। दुर्भाग्यवश लगभग 140 वर्ष बीतने पर भी ये सिद्धांत अपनी जड़ नहीं जमा सके। प्राचीन व्यवस्था या तो अपने पूर्णतः मूल रूप में अथवा इन दोनों सिद्धांतों की नाममात्र स्वीकार्यता के साथ बनी रही है। कुछ देशों को छोड़कर, विश्व में कहीं भी न तो स्वशासी सरकार रही है और न ही आत्मनिर्णय के अधिकार वाली सरकार। यह सब यथार्थ है। पर श्रमिकों द्वारा अपनाए गए इस रूख के विरुद्ध यह कोई तर्क नहीं है कि नई व्यवस्था की स्थापना की आरंभिक शर्त है - नाजी शक्तियों के विरुद्ध विजय। इसका अभिप्राय यही है कि श्रमिक को अधिक सतर्क रहना चाहिए और नाजियों पर विजय प्राप्त करके ही युद्ध समाप्त नहीं हो जाता। क्योंकि तब तक शांति नहीं होगी जब तक पुरानी व्यवस्था पर, चाहे वह कहीं भी हो, विजय नहीं प्राप्त कर ली जाती।
श्रमिक और राष्ट्रीयता
श्रमिकों के अधिक गंभीर विरोधी राष्ट्रवादी ही हैं। वे श्रमिकों को इसलिए कोसते हैं क्योंकि उनका दृष्टिकोण भारतीय राष्ट्रवाद के लिए हानिकारक एवं असंगत है। इनकी दूसरी आपत्ति है कि श्रमिक तो भारत की स्वतंत्रता की गारंटी लिए बिना भी युद्ध लड़ने को सहमत हैं। यह प्रश्न प्रायः उठता है और इतनी गंभीरता से इस पर बहस होती है कि यह बताना आवश्यक हो गया है कि इस बारे में श्रमिक के क्या विचार हैं।
जहां तक राष्ट्रवाद की बात है, श्रमिकों का दृष्टिकोण बहुत स्पष्ट है। श्रमिक राष्ट्रीयता को भूत भगाने का मंत्र बनाने को तैयार नहीं है। यदि राष्ट्रीयता का अर्थ है अपने अतीत की पूजा करना - ऐसी हर वस्तु का बहिष्कार जो मूल रंग रूप में