32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं है - तो श्रमिक राष्ट्रीयता को अपनी आस्था नहीं बनाएगा। श्रमिक मृतकों की जीवंत आस्था को जीवितों की मृत आस्था नहीं बनने देगा। श्रमिक मानव की बढ़ती हुई आकांक्षा का अतीत के द्वारा हनन बर्दाश्त नहीं करेगा - जिसके लिए वर्तमान का कोई अर्थ नहीं और भविष्य में कोई उम्मीद नहीं और न ही इसे स्थानीय विशिष्टता के संकीर्ण सांचे में ढलने देगा।
श्रमिक की आस्था अंतर्राष्ट्रीयता में है। श्रमिक राष्ट्रीयता में मात्र इसलिए दिलचस्पी रखता है जिससे कि प्रजातंत्र की गाड़ी चलती रहे अर्थात प्रतिनिधि संसद, उत्तरदायी कार्यपालिका, संवैधानिक प्रथाएं आदि राष्ट्रीय मनोभावनाओं से जुड़े समुदाय मं अच्छी तरह काम कर सके। श्रमिक की राष्ट्रीयता किसी लक्ष्य तक पहुंचने का साधन मात्र है। यह अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है जिसके प्रति श्रमिक त्याग करने को सहमत हो क्योंकि उसे ही वह जीवन का सबसे आवश्यक सिद्धांत मानता है।
स्वतंत्रताः गलत दृष्टिकोण
स्वाधीनता का अर्थ मात्र यही है कि श्रमिक इसका महत्व पूर्णतः पहचानता है। लेकिन श्रमिक सोचता है कि स्वतंत्रता के प्रश्न पर गलत दृष्टिकोण है और इसके महत्व के बारे में गलतफहमी है। राष्ट्र पर अपनी स्वतंत्रता से सरकार और सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप निश्चित करने का कोई बंधन नहीं हो जाता। स्वाधीनता कितनी उपयोगी है यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार और कैसे समाज की रचना होती है। स्वाधीनता का उस दशा में कोई मूल्य नहीं रह जाएगा यदि उससे ऐसी सरकार बनती है और ऐसे समाज का निर्माण होता है जिसके विरुद्ध विश्व युद्ध चल रहा है। श्रमिक चाहता है कि नए भारत के निर्माण पर अधिक बल दिया जाए और भारत छोड़ों पर कम। नई व्यवस्था के साथ नए भारत के निर्माण की अपील स्वाधीनता के आह्वान से अधिक महत्वपूर्ण है। वस्तुतः नए भारत में नई व्यवस्था का विचार स्वाधीनता संग्राम को जीने में सार्थक भूमिका निभाएगा। ऐसे दृष्टिकोण से निश्चित रूप से अनेक परेशान करने वाले तत्व शांत हो जाएंगे जो पूछे जा रहे हैं कि आजादी किस लिए और किसके लिए?
दूसरी बात है युद्ध प्रयासों में सहायता के लिए शर्त के रूप में तुरंत स्वाधीनता मिल जाना। श्रमिक की समझ में यह बात नहीं आती। इस शर्त से कुछ लोगों के दृष्टिकोण में युद्ध के प्रश्न पर अचानक परिवर्तन हुआ है और इसे तभी उचित कहा जा सकता है जब कोई अचानक ऐसा षड्यंत्र किया गया हो जो भारत को उसकी स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित करता हो। किन्तु ऐसे किसी षंड्यंत्र का कोई सबूत नहीं है। न ही ऐसा कोई षंड्यंत्र सफल हो सकता है, चाहे षड्यंत्रकारी कोई भी क्यों न हो। श्रमिक की दृष्टि से, भारत को स्वाधीनता के अधिकार से कोई वंचित