भारतीय श्रमिक युद्ध जीतने के लिए क्यों दृढ़-संकल्प हैं
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नहीं कर सकता यदि एकजुट लोगों की संयुक्त शक्ति यह मांग करे। यदि भारत की स्वाधीनता अधर में है तो यह भारतीयों में ही बिखराव के कारण है। भारत की स्वाधीनता के शत्रु भारतीय ही हैं, कोई और नहीं
श्रमिक और युद्ध
इस युद्ध की बाबत श्रमिकों का दृष्टिकोण इस बात का पूर्ण एहसास हो जाने के बाद बना है कि युद्ध में क्या कुछ दांव पर लगा है। श्रमिक को पता है कि यदि संसार से युद्ध समाप्त करने हैं तो युद्ध को जीतना भी होगा और शांति को भी। श्रमिक को पता है कि नाजियों को हटाना ही पर्याप्त नहीं है। नाजी व्यवस्था की संभावनाओं को भी नष्ट करना होगा। यह पुरानी व्यवस्था या नाजी व्यवस्था के लिए युद्ध नहीं है। श्रमिक को पता है कि इस युद्ध की कीमत पर नई व्यवस्था लानी होगी जिसमें स्वतंत्रता, समानता और सौहार्द केवल नारे के रूप में न हों बल्कि जीवन का यथार्थ बन जाए। किन्तु सब प्रश्नों का महा प्रश्न यह है कि नई व्यवस्था की आशा कैसे पूर्ण हो? इस प्रश्न पर श्रमिक बहुत आशावादी हैं। श्रमिक इस बात पर जोर देता है कि इन सभी आदर्शों को पूरा करने के लिए एक आरंभिक शर्त है, और वह है युद्ध में विजय। युद्ध में विजय के बिना भारत में स्वायत्तशासी सरकार नहीं हो सकती। युद्ध में विजय के बिना, स्वतंत्रता पाना स्वप्न भर होगा। यही कारण है कि श्रमिक युद्ध जीतने के लिए इतना कृत-संकल्प हैं।
वर्तमान युद्ध की दो विशिष्टिताएं
इस युद्ध में अनेक अच्छी संभावनाएं छुपी हैं। इनमें नई व्यवस्था को जन्म देने की क्षमता हैं। श्रमिक को पता है कि यह युद्ध अन्य युद्धों से भिन्न है। यहां दो लक्षण हैं जो इसे अन्य युद्धों से पृथक करते हैं। पहली बात तो यह है कि यह युद्ध इसलिए नहीं हो रहा है कि शक्तिशाली देश आपस में विश्व का राज्यक्षेत्र बांट लें जैसाकि इसके पहले लड़ गए युद्धों में हुआ था। यह युद्ध मात्र संसार का राज्यक्षेत्र बांटने के कारण से नहीं लड़ा जा रहा है। यह युद्ध कुछ आदर्शों को लेकर लड़ा जा रहा है, कि किस प्रकार की सरकारें बने जिनमें मानवता फले-फूले। दूसरे यह युद्ध अन्य युद्धों की तरह मात्र युद्ध नहीं है। इसका उद्देश्य केवल शत्रु को हराकर उसकी राजधानी पर कब्जा का शांति की शर्तें मनवाना नहीं है।
यह युद्ध केवल युद्ध ही नहीं एक क्रांति है। ऐसी क्रांति समेकित जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन और समाज के पुनर्गठन की मांग करती है। इस दृष्टि से, यह आम जनता का युद्ध है और यदि ऐसा नहीं है तो इसे जनता का युद्ध बनाया जाना चाहिए।