8. भारतीय वित्त विधेयक - Page 68

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भारतीय वित्त विधेयक

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (श्रम सदस्य)ः श्रीमान मैं उन आलोचनाओं का उत्तर दे रहा हूं कि जो इस बहस के दौरान माननीय सदस्यों द्वारा कुछ मुद्दों पर या भूलचूकों पर, जिसका संबंध श्रम विभाग से है, की गई हैं। मैं सर फ्रेड्रिक जेम्स द्वारा उठाए गए मुद्दों से आरंभ करूंगा। जैसा कि सदन को विदित है, जहां तक श्रम विभाग का संबंध है, दो ऐसे मुद्दे हैं जिन पर माननीय सदस्य ने विशेष रूप से जोर दिया है पहला मुद्दा कागज से सम्बंधित है। सर जेम्स फ्रेंड्रिक ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत सरकार कागज के उपयोग के संबंध में किस हद तक अपव्ययी है और जिधर भी देखिए इस बरबादी के लिए सरकार उत्तरदायी है। महोदय, सदन को याद होगा कि इसी कागज के प्रश्न को लेकर इसी सत्र के दौरान स्थगन प्रस्ताव के ऊपर बहस हुई थी और सरकार की ओर से मैंने उत्तर दिया था। यह स्पष्ट है कि मेरे माननीय दोस्त सर फ्रेड्रिक जैम्स उस समय सरकार की ओर से दिए गए उत्तर से संतुष्ट नहीं थे और आज इसी विषय को लेकर उठ खड़े हुए है। उनके पुनः इस प्रश्न को लेकर खड़े होने के प्रति मेरी कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मुझ इस बात की प्रसन्नता है कि मुझे इससे यह स्पष्ट करने के लिए एक और अवसर प्राप्त हुआ है कि कागज के संरक्षण के संबंध में सरकार क्या कुछ कर रही है। महोदय, विषय पर आने से पूर्व सदन से यह कहना वांछनीय होगा कि जहां तक मुझे जानकारी है ऐसा प्रतीत होता है कि सदन इस बात को लेकर कुछ अधिक चिंतित दिखाई देता है कि कागज की घोर कमी है। किन्तु मैं नहीं समझता कि इस विषय में कोई बड़ी परेशानी है। सदन के वास्ते यह दिलचस्प बात होगी यदि मैं ग्रेट ब्रिटेन और भारत मेंं जारी किए गए किन्हीं प्रकाशनों संबंधी आंकड़ों को माननीय सदस्यों के सम्मुख पेश करूं। महोदय, ग्रेट ब्रिटेन में सन 1939 के दौरान पन्द्रह हजार पुस्तकें और सन 1940 में ग्यारह हजार पुस्तकें प्रकाशित हुई, जब कि सन 1941 में यह आंकड़ा बढ़कर चौदह हजार हो गया। मैं यह नहीं कहता हूं कि कागज की कमी का सवाल ऐसा नहीं है