8. भारतीय वित्त विधेयक - Page 71

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तत्पश्चात ‘‘इंडियन इनफारमेशन’’ के संबंध में, सदन को यह जानने में दिलचस्पी होगी कि हमने इस आशय के आदेश जारी कर दिए हैं कि इसका आकार आधा कर दिया जाए।

जहां तक पत्रों का प्रश्न है, सदन को मैं बताना चाहता हूं कि वस्तुतः युद्ध की अवधि के दौरान 149 पत्रों को रोक दिया गया है और 190 पत्रों को बिल्कुल ही समाप्त कर दिया गया है। दूसरे, पत्रों का आकार भी 1941 के आकार से छोटा कर दिया गया है। जुलाई, 1942 के बाद मुद्रित पत्रों में फालतू जगहें नहीं रखी गई हैं। मैं कहना चाहूंगा कि यदि माननीय सदस्यों को कोई सुझाव भारत सरकार को देना है तो निश्चय ही मैं अत्यधिक अनुग्रहीत होऊंगा और अपना यथेष्ठ ध्यान उस पर दूंगा।

फिर प्रकाशन के संबंध में मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हूं कि जब तक पूर्णतः अनिवार्य न हो जाए, कोई बात प्रकाशित नहीं की जाती। किसी भी प्रकाशन की अनिवार्यता अवधारित करने के लिए भारत सरकार ने प्रकाशन पर तीन प्रकार की रोकें लगा रखी हैं। पहली रोक, नियंत्रक मुद्रण और लेखन सामग्री द्वारा लगाई जाती है। अब वह केवल ऐसा मशीनी व्यक्ति नहीं रह गया है जो मुद्रण आदेशों के पालन से वास्ता रखता था, अब हमने उसे प्राधिकृत कर रखा है कि उसके समक्ष पेश प्रकाशन की विषय-वस्तु के प्रकाशित होने की अनिवार्यता की जांच करें। यदि वह असहमत होता है और आपत्ति करता है तो यह बात श्रम विभाग के सचिव के पास भेजी जाती है, जो इस प्रश्न पर विचार करते हैं और अगर श्रम विभाग और मुद्रण नियंत्रक एकमत हो जाएं कि प्रकाशन अनिवार्य नहीं है तब यह बात विचार के लिए एक समिति को सौंप दी जाती है जिसका निर्णय अंतिम माना जाता है। फिर महोदय हमने मुद्रकों को भी अनुदेश दे रखा है कि वह मुद्रण में स्थान, पार्श्ववर्ती छूट तथा अन्य बातों के संबंध में और कागज के उपयोग के संबंध में अधिक से अधिक मितव्ययिता बरतें। मेरा विश्वास है कि यद्यपि भारत सरकार के द्वारा उठाए गए ये कदम बहुत प्रभावशाली नहीं हैं, तथापि कागज के उपभोग में मितव्ययिता लाने के लिए निस्संदेह यह एक गंभीर कदम है। महोदय, जैसी कि कहावत है, हाथी से एक चींटी की चाल चलने की आशा कोई नहीं कर सकता। भारत सरकार, या कह लें कोई सरकार, एक विशाल जानवर है जो धीरे-धीरे चल रहा है और उसकी गति मंद हैं। फिर भी यह आशा की जा सकती है कि यह हंस की चाल सीखें। और मैं समझता हूं कि सदन इस बात से सहमत होगा कि भारत सरकार ने हंस की चाल सीख ली है_ यदि नहीं सीखी है, तो सीखने को तैयार है।

सर फ्रेड्रिक जेम्सः यह हंस अभी काफी छोटा है।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः अब महोदय मैं अपने माननीय मित्र सर फ्रेड्रिक जेम्स द्वारा भारत सरकार में कागज के व्यय संबंधी मितव्ययिता लाने के संबंध