48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उन अधिकारियों की मनःस्थिति और मानसिक संतोष को कैसे प्रभावित कर सकता है जिनकी सेवाएं युद्ध संबंधी तैयारियों में अपेक्षित हैं। ऐसी व्यवस्था करने में जो कुछ कठिनाइयां आ सकती हैं उन्हें कम करने के लिए भारत सरकार ने शिमला में तीन आवासीय गृह खोले हैं ताकि ऐसे अधिकारियों की, जो अपना केंद्र छोड़ नहीं सकते, पत्नियां वहां रह सकें। मैं आशा करता हूं कि सर फ्रेड्रिक जेम्स इसे इस गंभीर समस्या के प्रति भारत सरकार की सद्भावना का प्रतीक मानेंगे।
अब मैं तीसरे बिंदु पर आता हूं जो मेरे माननीय मित्र सर जमनादास मेहता ने उठाया है।
श्री जमनादास एम. मेहताः मुझे माफ कीजिएगा।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं आशा करता हूं कि आपको नाइट-हुड मिलने जा रही है, मैं न वापस लूंगा और न क्षमता मागूंगा_ इस इतना ही कहना चाहूंगा कि यह पूर्वानुमान है।
मौलाना जफर अली खां (पूर्वी मध्य पंजाबः मुस्लिम) आने वाली घटनाएं अपना पूर्वाभास दे देती है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः श्री जमनादास मेहता ने अपनी बहस के दौरान डोमिनियन लेबर ट ्र ेड यूनियन कांग्रेस की उस बैठक का उल्लेख किया जो इंग्लैंड में होने जा रही है या होने वाली है और शिकायत की कि उस डोमिनियन सम्मेलन में भारतीय श्रमिकों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। महोदय, श्री जमनादास मेहता ने जिस खेद और तकलीफ का इजहार किया है उसे मैं भी महसूस करता हूं जो इतने महत्वपूर्ण श्रम सम्मेलन में भारतीय श्रमिकों का प्रतिनिधित्व न होने से हुआ है। परंतु मैं भी जमुनादास मेहता से कहना चाहूंगा कि सरकार के श्रम विभाग पर किसी भी प्रकार से इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का दायित्व नहीं है। मैं उन्हें यह भी कहना चाहूंगा कि इस सम्मेलन के संयोजकों ने श्रम विभाग से कोई पूछताछ नहीं की।
मुझे विश्वास है कि श्री जमुनादास मेहता इस बात को मानेंगे कि वास्तव में हम इसमें कुछ नहीं कर पाए क्योंकि हमसे परामर्श ही नहीं किया गया। उन्होंने हमसे परामर्श क्यों नहीं किया और क्यों उन्होंने इस देश में श्रमिक आंदोलन के नेताओं से, जिनका इस सम्मेलन के लिए कार्य कर रहे महानुभावों से अच्छा परिचय है, सीधे संपर्क किया, मैं बहुत अच्छी तरह समझ सकता हूं। लेकिन मैं समझता हूं कि श्री मेहता इस बात से सहमत होंगे कि श्रम विभाग अपनी स्थिति और अपने हित को सुरक्षित रखने के मामले में उतना ही सतर्क और चौकस है जितना कि कोई विभाग हो सकता है। बस मुझे इतना ही कहना है।